अशोक भाटिया
मैदानी इलाकों में इस बार चुभने वाली गर्मी महसूस हो रही है। सूरज की किरणें इतनी तीखी लग रही हैं जितनी पहले नहीं लगती थीं। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने भी चेतावनी दी है कि इस साल मैदानी इलाकों सहित पहाड़ी इलाकों में भी गर्मी सामान्य से अधिक पड़ेगी। भारतीय मौसम विभाग की मंथली रिपोर्ट देखें तो पता चलता है कि, जलवायु संकट के कारण देश में अब हर मौसम प्रभावित हो रहा है। अप्रैल 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में भीषण गर्मी पड़ने वाली है। आंकड़ों के मुताबिक दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों में से 92 भारत के हैं। AQI।in के अनुसार, टॉप के 20 सबसे गर्म स्थानों में से 19 भारत में हैं, जहां तापमान अप्रैल में ही 45°C से ऊपर जा रहा है।रिपोर्ट्स की मानें तो भारत का 55 प्रतिशत हिस्सा गर्मी के हाई हीट रिस्क जोन में आ चुका है। भारत के अलावा, विश्व के सबसे गर्म देशों की सूची में अक्सर माली, बुर्किना फासो, सेनेगल, कुवैत और इराक जैसे खाड़ी देश शामिल होते हैं, लेकिन वर्तमान में भारत सबसे ज्यादा प्रभावित है। अगर दुनिया की स्थिति पर गौर करें तो पिछले करीब डेढ़ दशक से दुनिया का सामान्य तापमान एक डिग्री सेल्सियस से अधिक रिकॉर्ड किया गया है। 2026 पर गौर करें तो दुनिया में नॉर्मल से 1।44 डिग्री अधिक तापमान बढ़ा है। अगले साल यानी 2027 में गर्मी प्रचंड रूप में पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ देगी।ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में इस साल आखिर इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है? देश में बढ़ती गर्मी यानी हीट वेव की वजह हीट डोम, कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं। हीट डोम गर्म हवा को जमीन के पास कैद कर रहा है और इसकी वजह से वायुमंडल में उच्च दबाव के कारण एक ‘अदृश्य ढक्कन’ बन गया है, जो गर्म हवा को ऊपर उठने से रोककर जमीन के करीब ही कैद कर रहा है, जिससे तापमान में भारी वृद्धि हो रही है। पृथ्वी के बढ़ते तापमान के कारण हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता बहुत बढ़ गई है।इसके कारण शहरों में कंक्रीट की इमारतें और सड़कें दिन भर गर्मी सोखती हैं और रात में छोड़ती हैं, जिससे रातें भी गर्म हो रही हैं। वृक्षों की कमी और गिरते भूजल स्तर के कारण नमी कम हो गई है, जिससे शुष्क गर्मी का प्रभाव बढ़ गया है।साथ ही जलवायु परिवर्तन भी बड़ी वजह है, जिसमें अल नीनो का प्रभाव और शहरों में कंक्रीट के बढ़ते उपयोग (अर्बन हीट आइलैंड) से तापमान के पार जा रहा है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने दिया है और चेतावनी दी है कि अल-नीनो-ला नीना अब जलवायु संकट के साथ मिलकर मौसम पैटर्न में बदलाव ला रहे हैं। NOAA और ECMWF ने कहा कि संभावना है कि जून-अगस्त 2026 में अल-नीनो 62 प्रतिशत ज्यादा बनेगा। फिर यह अगस्त से अक्टूबर तक 80 फीसदी तक बढ़ सकता है।सबसे गर्म शहरों की बात करें तो बिहार का भागलपुर, ओडिशा का तालचेर, पश्चिम बंगाल के आसनसोल में तापमान 44°C से 45°C तक दर्ज किया गया है। एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की 2025 जिला-स्तरीय रिपोर्ट कहती है कि भारत के 734 जिलों में से 417 जिले यानी आधे से ज्यादा जिले हाई या वेरी हाई हीट रिस्क जोन में हैं। वर्तमान में भारत के कई बड़े शहर इस अदृश्य गुंबद के नीचे तप रहे हैं। उत्तर भारत में दिल्ली, कानपुर, बांदा और लखनऊ जैसे शहर आग की लपेट में हैं। मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में भीषण गर्मी का प्रकोप है। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में अकोला, अमरावती और वर्धा जैसे जिलों में पारा 45 डिग्री के ऊपर बना हुआ है। वहीं राजस्थान और तेलंगाना में भी स्थिति भयावह है। गर्मी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के इन शहरों का तापमान वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक दर्ज किया जा रहा है। यह स्थिति न केवल इंसानों बल्कि फसलों और पशुओं के लिए भी काल बन रही है।मौसम विभाग ने अन्य कई राज्यों में भीषण लू की चेतावनी भी जारी की है। बदलते मौसम पैटर्न के मुताबिक दिन में गर्मी तो रहती ही है, रात में भी गर्मी से राहत नहीं मिल रही है, इसे ‘वार्म नाइट्स’ कहते हैं। जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 6।4 डिग्री से ज्यादा हो तो इसे ‘सीवियर वार्म नाइट’ कहा जाता है और यही वजह है कि रातें ज्यादा गर्म हो रही हैं। read more:https://pahaltoday.com/problems-of-municipal-bodies-will-be-resolved-quickly-development-plans-will-gain-momentum-dm-anupam-shukla/मेडिकल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि दिन में गर्मी पड़ती है तो रात में शरीर ठंडा होकर रिकवर करता है, लेकिन गर्म रातों में यह राहत नहीं मिलती, इससे डिहाइड्रेशन, नींद खराब होना, हाई ब्लड प्रेशर, थकान, चिड़चिड़ापन और हीट-स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।बता दें कि साल 1998-2017 के बीच दुनिया में 1।66 लाख लोगों की मौत हीटवेव से हुई थी। भारत में 2023 में 48,000 हीटस्ट्रोक केस और 159 मौतें दर्ज हुईं।CSE रिपोर्ट के मुताबिक, 2030 तक भारत में ग्लोबल वार्मिंग से 5।8 प्रतिशत वर्किंग ऑवर्स गंवाने का अनुमान है।2015-2100 के बीच एक 2025 मॉडलिंग स्टडी के अनुसार, गर्म रातें हर दशक में 10 से 13 दिन बढ़ सकती हैं और कंपाउंड हीटवेव और आम होंगे।बढ़ते तापमान के कारण हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं। दूसरी तरफ अर्थशास्त्री और स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि, यह भीषण गर्मी सिर्फ तापमान ही नहीं बढ़ाएगी बल्कि यह आर्थिक विकास को धीमा करेगी, उत्पादकता घटाएगी और मेडिकल खर्चों को बहुत ज्यादा बढ़ा देगी।इसके अलावा हीट डोम को समझने के लिए आप एक प्रेशर कुकर या ढक्कन लगे बर्तन की कल्पना कीजिए। मौसम विज्ञान के अनुसार, जब ऊपरी वायुमंडल में उच्च दबाव का एक बहुत बड़ा क्षेत्र बन जाता है, तो वह किसी ढक्कन की तरह काम करने लगता है। सामान्य तौर पर सूरज की रोशनी से गर्म होकर हवा ऊपर उठती है और ठंडी हो जाती है, जिससे बादल बनते हैं या तापमान संतुलित रहता है। लेकिन हीट डोम की स्थिति में उच्च दबाव वाली हवा नीचे की ओर उतरती है और सतह की गर्म हवा को ऊपर नहीं उठने देती है। यह प्रक्रिया गर्म हवा को एक गुंबद की तरह एक ही जगह पर कैद कर लेती है, जिससे तापमान लगातार बढ़ता ही चला जाता है।जब यह गर्म हवा गुंबद के अंदर फंस जाती है, तो सूरज की किरणें इसे और ज्यादा तपाती रहती हैं। चूंकि हवा बाहर नहीं निकल पाती और न ही ठंडी हवा अंदर आ पाती है, इसलिए उस पूरे इलाके में गर्मी जमा होती रहती है। समुद्र के ऊपर गर्म हवा का बनना और उच्च दबाव द्वारा उसे नीचे धकेलना इस प्रक्रिया को और ज्यादा हिंसक बना देता है। यही कारण है कि उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से लेकर मध्य प्रदेश और राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों तक में तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यहां तक कि रात के समय भी पारा नीचे नहीं गिर रहा है, जिससे लोगों को चौबीसों घंटे राहत नहीं मिल पा रही है।अक्सर लोग हीटवेव (लू) और हीट डोम को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें तकनीकी अंतर है। हीटवेव आमतौर पर कुछ दिनों की मौसमी घटना होती है, जो हवाओं के रुख के साथ बदल सकती है। वहीं, हीट डोम एक बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र को अपनी चपेट में लेता है और लंबे समय तक वहां गर्मी को ट्रैप यानी कैद करके रखता है। नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के मुताबिक, जब मजबूत उच्च दबाव वाली स्थितियां एक ही जगह स्थिर हो जाती हैं, तो वह हीट डोम का रूप ले लेती हैं। यह हीटवेव के मुकाबले कहीं अधिक स्थिर और विनाशकारी होता है, क्योंकि यह जल्दी खत्म नहीं होता है।हीट डोम को विशेषज्ञों ने साइलेंट किलर का नाम दिया है। यह इंसान के शरीर को धीरे-धीरे अंदर से खोखला करता है। जब तापमान 45 डिग्री के पार जाता है और हीट इंडेक्स (महसूस होने वाली गर्मी) 50 डिग्री तक पहुंच जाता है, तो शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है। इससे हीट स्ट्रोक, गंभीर डिहाइड्रेशन, किडनी फेलियर और हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ती हैं। खासकर बुजुर्गों, छोटे बच्चों और चिलचिलाती धूप में काम करने वाले मजदूरों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित होती है। रात में भी ठंडक न मिलने के कारण शरीर की रिकवरी नहीं हो पाती, जो मानसिक तनाव और शारीरिक थकान को कई गुना बढ़ा देती है।हीट डोम का असर सिर्फ अस्पताल की कतारों तक सीमित नहीं है। यह भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट पहुंचा रहा है। भीषण तापमान के कारण खेतों में खड़ी फसलें समय से पहले सूख रही हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट की आशंका है। इसके साथ ही जल संकट भी गहराता जा रहा है क्योंकि झीलों और नदियों का पानी तेजी से वाष्पित हो रहा है। भारत में मानसून से पहले यानी मार्च से जून के बीच हीट डोम बनने की आवृत्ति पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब ये घटनाएं अधिक समय तक टिकने वाली और अधिक विनाशकारी होती जा रही हैं।