सरकार 543 सीटों में महिला आरक्षण क़ानून लागू करे

Share

ओंकार नाथ सिंह
को उत्तर प्रदेश की सरकार ने अपने पूरे दमखम के साथ नारी शक्ति वंदन संशोधन विधेयक के लोक सभा में पारित न होने के विरोध में एक जन आक्रोश महिला पदयात्रा का प्रदर्शन किया जिसमें मुख्यमंत्री सहित पूरा मंत्रिमंडल भाजपा के विधायकों , नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। इसमें भारी संख्या में भाजपा की महिला कार्यकर्ता और नेता शामिल हुईं।? दिलचस्प बात यह थी कि यह यात्रा मुख्यमंत्री आवास से मुख्यमंत्री सचिवालय तक हुई। इसमें इनका साथ सत्ता में शामिल होने वाले सहयोगी दलों ने भी दिया। इस प्रदर्शन के कारण इस भीषण गर्मी में लखनऊ की जनता का बुरा हाल था। जिधर देखो उधर ही भयंकर जाम लगा था। जब शासन प्रशासन ही किसी कार्यक्रम का हिस्सा बनेगा तो भीड़ तो होगी ही और यदि लखनऊ की जनता को इस भीड़ के कारण परेशानी हो भी तो क्या फ़र्क़ पड़ता है। पूरे प्रदर्शन मार्ग पर जगह जगह जो होर्डिंग लगी थीं उसमे कांग्रेस और सपा को कोसा जा रहा था। इस प्रदर्शन में एक और दिलचस्प बात देखने को मिली । कोई भी धरना प्रदर्शन सचिवालय के आसपास करने की अनुमति किसी भी दल या संस्था को नहीं है लेकिन भाजपा के इस प्रदर्शन को सभा में बदलने के लिए लखनऊ की पुलिस ने मुख्यमंत्री आवास और सचिवालय के सामने भी स्टेज बनाए जाने की अनुमति दे दी। यह प्रदर्शन किसे दिखाया जा रहा था या बात समझ में नहीं आई। सबसे पहले समझने की यह आवश्यकता है कि क्या प्रदेश और केंद्र की सरकार को किसी प्रदर्शन का हिस्सा बनना चाहिए। लोकतंत्र किस स्थान पर आ चुका है। मुझे याद है कि उत्तर प्रदेश में 1967-68 में चौधरी चरण सिंह संयुक्त विधायक दल की सरकार में मुखिया थे जिसने सभी विपक्षी दलों की मदद से पहली बार प्रदेश में ग़ैर कांग्रेस सरकार बनी थी। उस समय संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का एक आंदोलन केंद्र की कांग्रेस सरकार के विरुद्ध हो रहा था । उत्तर प्रदेश में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के घटक से प्रभु नारायण सिंह जी राजस्व मंत्री थे । वह आंदोलन में दिल्ली भाग लेने जा रहे थे तब चौधरी साहब ने उनसे कहा था कि उचित होता कि आप मंत्री पद से त्यागपत्र देकर आंदोलन में भाग लें। किसी भी सरकार के सदस्य को आंदोलन नहीं करना चाहिए इससे उसकी गरिमा गिरती है और आज मुख्य मंत्री सहित पूरा मंत्रिमंडल ही प्रदर्शन का हिस्सा बन रहा है। दूसरी बात यह सरकार किस पर दबाव बना रही है।read more:https://pahaltoday.com/amrit-sarovar-built-at-a-cost-of-lakhs-dries-up-questions-raised-on-responsibility/ क्या यह प्रदर्शन केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है ? यदि ऐसा है तो प्रदर्शन से बेहतर तरीका विधान सभा में यह प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजे कि इस विधेयक को पारित करने के लिए केंद्र सरकार लोकसभा भंग कर मध्यावधि चुनाव कराए जिससे दो तिहाई बहुमत प्राप्त करे और इस बिल को पारित कराए जैसे इंदिरा जी ने 1971 में बैंको के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स समाप्त करने के लिए लोकसभा का मध्यावधि चुनाव कराया था। अब इसे समझें कि यह आंदोलन जिस नारी वंदन अधिनियम के लिए हो रहा था वह तो 2023 में ही पारित हो चुका है। उसे सरकार ने अब तक लागू क्यों नहीं किया? सरकार को इसे स्पष्ट करना चाहिए था। ऐसा न करने से यह प्रतीत होता है कि यदि सरकार महिला आरक्षण विधेयक लोकसभा की 545 सीटों में ही लागू करती तो तैंतीस प्रतिशत पुरुषों की संख्या कम हो जाती जिसे सरकार कम नहीं करना चाहती है। इसका सीधा मतलब है कि सरकार पुरुषों की संख्या कम करके वह महिलाओं को कोई भी अधिकार देने के पक्ष में नहीं है। इसीलिय यह परिसीमन संशोधन ला रहे थे जिसमें पचास प्रतिशत सीटों की बढ़ोतरी का प्रस्ताव था। उससे सरकार को दो फायदे थे एक तो तैंतीस प्रतिशत महिलाओं का आरक्षण बिना पुरुषों की संख्या कम किए पूरा होगा और सामान्य कोटे में पंद्रह प्रतिशत सीटों का इज़ाफ़ा भी हो जाएगा। इस पूरे प्रकरण में सरकार के ऊपर लगभग पंद्रह हज़ार करोड़ रुपये का भार बढ़ेगा । इस क़र्ज़दार देश में यह अतिरिक व्यय कहाँ तक न्यायोचित है यह जनता स्वयं सोचे। इस प्रदर्शन से लखनऊ के लोगों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ा यह केवल लखनऊ के लोग ही बता सकते हैं। क्या यही लोकतंत्र है कि सत्ता पक्ष के लोग जहाँ चाहें कोई भी कार्यक्रम हो चाहे वह धरना प्रदर्शन ही क्यों न हो , वह कहीं भी कर सकते हैं उनके लिए न्यायालय के आदेश भी कोई मायने नहीं रखते। क्या यह सारे नियम कानून केवल विपक्षी पार्टियों के लिए ही हैं जो यदि वह किसी मुद्दे पर प्रदर्शन करना चाहें तो अपने कार्यालय से भी बाहर भी नहीं निकल सकते । यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि सरकार यदि कोई प्रदर्शन करेगी तो वह तो दमदार तरीक़े से होगा ही क्युकी सत्ता उसके पास है और वह सत्ता के सभी साधनों का उपयोग करती है । प्रदर्शन तो विपक्ष के लिए लोकतंत्र में बना है जो सरकार को ग़लत काम करने से रोकता है। वह जनता के मुद्दों को सरकार तक पहुँचाने का काम करता है जिसे सरकार अगर ध्यान नहीं देती है। यदि देश और केंद्र की सरकार विपक्ष के विरुद्ध प्रदर्शन करेगी तब देश में लोकतंत्र नहीं तानाशाही हो जाएगी । यह सरकार इतिहास से सबक नहीं ले रही है। इसी लखनऊ शहर में बीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में बेगम हज़रत महल पार्क में एक विशाल रैली हुई थी जिसमे लाखों लोगों ने शिरकत किया था लेकिन 1989 में कांग्रेस की सरकार अपदस्थ हो गई थी। फिर मुलायम सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में लामर्टीनियर ग्राउंड में विशाल रैली हुई जिसमे लगभग पाँच लाख लोगों ने भाग लिया लेकिन मुलायम सिंह जी भी चुनाव हार गए थे। रैली और प्रदर्शन तभी तक फायदेमंद होते हैं जबतक जनता सरकार से संतुष्ट रहेगी। मेरे विचार से सरकार के पास दो मज़बूत विकल्प हैं। पहला वह 545 की संख्या वाली लोकसभा में महिला आरक्षण क़ानून लागू करे और महिला आरक्षित सीट को चुनाव आयोग द्वारा इंगित कराए। इसमें जो भी आयोग आदि बनाना हो उसे करे। और दूसरा वह इस मुद्दे पर जनता के सामने मध्यावधि चुनाव में जाये कि बिना लोकसभा में सीटों को बढ़ाये वह महिला आरक्षण लागू नहीं कर सकती। फिर जनता को फ़ैसला करने दे यदि जनता दो तिहाई बहुमत से भाजपा की सरकार बनवा देती है तो इसकी जीत नहीं तो विपक्ष जो कहता है उसकी जीत मानी जाएगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *