गर्मी का कहर, पसीने की धारा में डूबा उत्तर प्रदेश

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अजय कुमार,
उत्तर प्रदेश में अप्रैल का अंतिम सप्ताह आग की लपटों भरा साबित हो रहा है। सूरज की तपिश ने आम आदमी को घर की चौखट से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया है, लेकिन बाहर निकलते ही पसीने की धाराएं बहने लगती हैं। इंसान ही नहीं, सड़कों पर भटकते कुत्ते, पेड़ों की डालियों पर तड़पते पक्षी और खेतों में लू के थपेड़ों से परेशान पशु भी इस गर्मी के सितम से जूझ रहे हैं। मौसम विभाग की चेतावनी ने हड़कंप मचा दिया है, दोपहर के समय बेवजह बाहर न निकलें, वरना जान जोखिम में पड़ सकती है। राज्य में पारा 45 डिग्री को छू चुका है और आने वाले दिनों में 47-48 तक पहुंचने की आशंका है। अमीरों के पास एयर कंडीशनर और कूलर हैं, लेकिन गरीब जनमानस, जो झोपड़ियों में रहता है, वह इस भट्टी जैसे मौसम से कैसे जूझ रहा है? सभी जिलों में ऐसे गर्मी से पीड़ित लोगों की दास्तान एक जैसी नजर आ रही है।लखनऊ की सड़कें दोपहर में वीरान हो जाती हैं। राजधानी का तापमान 44 डिग्री पार कर गया है। यहां के झुग्गी-झोपड़ी इलाकों में रहने वाले मजदूर रामू कहते हैं, साहब, दिन भर ठेला खींचते हैं, लेकिन दोपहर में छाया ढूंढते फिरते हैं। घर में तो पंखा भी गर्म हवा उड़ाता है। रामू जैसे हजारों लोग गर्मी से बचने के लिए पुराने कपड़ों से छत पर छाया बनाते हैं या नदी किनारे सोते हैं। बच्चे स्कूल से लौटते ही मिट्टी के घड़े से पानी पीते हैं। अमीर बस्तियों में कूलर की आवाज गूंजती है, लेकिन गरीबों के लिए एक गीला कपड़ा ही सहारा है। अस्पतालों में हीट स्ट्रोक के मरीज बढ़ रहे हैं। पिछले तीन दिनों में 50 से ज्यादा मामले दर्ज हो चुके हैं। महिलाएं रात को भी पसीने से तरबतर रहती हैं, नींद नहीं आती। वे कहती हैं, बच्चों को गोद में लेकर लेटती हैं, लेकिन गर्मी इतनी कि सांस लेना मुश्किल।कानपुर में हालात और भयावह हैं। यहां का पारा 45.5 डिग्री तक पहुंच गया। चमड़ा उद्योग के मजदूरों का दर्द सबसे ज्यादा है। फूलपुर की तंग गलियों में रहने वाली शकुंतला बाई बताती हैं, घर में बिजली नहीं आती, पंखा चले तो भी क्या। दिन भर सड़क पर पानी बेचते हैं, लेकिन खुद को पानी नहीं मिलता। वे गर्मी से निपटने के लिए नीम की पत्तियां चबाती हैं और सिर पर गीला तौलिया बांधती हैं। बच्चे दोपहर में खेलना भूल गए हैं, बस घर के अंदर अंधेरे कमरे में दुबके रहते हैं। पशु चिकित्सालयों में गर्मी से मरते जानवरों की संख्या बढ़ रही है। कुत्ते और गायें लू के थपेड़ों से गिर पड़ी हैं। किसान खेतों में फसलें सूखते देख रो रहे हैं, लेकिन खुद भी डिहाइड्रेशन से जूझ रहे हैं। गंगा नदी किनारे लोग नहाने जाते हैं, लेकिन पानी भी गुनगुना हो चुका है।वाराणसी के घाटों पर गर्मी ने घाटों को सुनसान कर दिया। पारा 46 डिग्री के करीब है। गंगा स्नान करने वाले श्रद्धालु अब सुबह जल्दी उतरते हैं, दोपहर में तो घाट खाली पड़े रहते हैं। काशी की गलियों में रहने वाले रिक्शा चालक रामप्रसाद कहते हैं, पैसेंजर नहीं मिलते, लेकिन भूखे नहीं सो सकते। गर्मी से सिर चकराता है, नमक-पानी का घोल पीते हैं। गरीब परिवारों में महिलाएं चूल्हा जलाना बंद कर देती हैं, बस ठंडे चावल खा लेती हैं। बच्चे स्कूल नहीं जाते, घर में लेटे रहते हैं। बुजुर्गों की हालत सबसे खराब है। वे छत पर सोने की कोशिश करते हैं, लेकिन हवा भी आग की तरह गर्म। गौशालाओं में गायें दम तोड़ रही हैं, चारा सूख चुका है। डॉक्टर सलाह देते हैं, नारियल पानी पिएं, लेकिन गरीबों के लिए वह भी महंगा साबित हो रहा है।प्रयागराज में संगम का पानी भी गर्म हो गया है। कुंभ क्षेत्र के आसपास रहने वाले मजदूरों का जीवन नर्क बन गया। तापमान 45 डिग्री से ऊपर। झोपड़ियों में रहने वाली विधवा कमला कहती हैं, पति चले गए, अब ये गर्मी ही दुश्मन है। दिन भर पानी के टैंकर के इंतजार में खड़ी रहती हूं। बच्चे डायरिया से पीड़ित हो रहे हैं, अस्पताल भरे पड़े हैं। रात में भी नींद नहीं आती, लोग नदी किनारे इकट्ठा होकर हवा का इंतजार करते हैं। किसानों की फसलें जल रही हैं, आलू और गेहूं बर्बाद हो गए। पशु-पक्षी भी तड़प रहे हैं। स्थानीय लोग पुरानी परंपरा निभा रहे हैं, गर्मी से बचने के लिए गुड़-चने खाते हैं और सिर पर पगड़ी बांधते हैं।गरा में ताजमहल की संगमरमर की चादरें भी गर्म हो रही हैं। पारा 44.8 डिग्री। पर्यटन प्रभावित हो गया है, लेकिन गरीब दिहाड़ी मजदूरों का क्या? सिकंदरा की बस्तियों में रहने वाले मोहन लाल कहते हैं, एसी का सपना देखते हैं, लेकिन गीले कपड़े से काम चलाते हैं। शाम को पार्क में सोते हैं। महिलाएं सिर पर भुट्टा भूनकर बेचती हैं, लेकिन खुद भूखी रह जाती हैं। बच्चे दोपहर में छुप जाते हैं, खेलना बंद। अस्पतालों में इलेक्ट्रोलाइट की किल्लत हो गई है। खेतों में किसान मूंगफली की फसल बचाने की जद्दोजहद कर रहे हैं, लेकिन लू ने सब बर्बाद कर दिया। सड़कों पर कुत्ते बेहोश पड़े मिल रहे हैं।मेरठ में गन्ने के खेत सूख रहे हैं। तापमान 45.2 डिग्री। उद्योग क्षेत्र के मजदूर दोपहर को छुट्टी ले लेते हैं, लेकिन गरीब किसान खेतों में ही डटे रहते हैं। लिसाड़ी गेट की झोपड़ियों में रहने वाली राधा कहती हैं, पंखा नहीं, बिजली बिल भर नहीं पाते। छत पर भूसे का पहाड़ा बनाया है। बच्चे स्कूल जाना छोड़ चुके हैं, घर में दुबके रहते हैं। रात को बिजली कट जाती है, तो गर्मी और बढ़ जाती। पशुओं को पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। डॉक्टरों का कहना है, ज्यादा पानी पिएं, लेकिन गरीबों के पास पीने का ही अभाव है।झांसी में बुंदेलखंड की धरती तप रही है। पारा 46.5 डिग्री तक। यहां सूखे की मार पहले से थी, अब गर्मी ने काम तमाम कर दिया। महोबा रोड की बस्ती में रहने वाले किसान हरि सिंह बताते हैं, फसल मर गई, मजूरी भी नहीं मिल रही। गर्मी से बचने के लिए कीकर के पेड़ तले सोते हैं। महिलाएं चमेली के फूल तोड़कर बेचती हैं, लेकिन सिर पर गर्मी का बोझ। बच्चे डिहाइड्रेशन से गिर रहे हैं। गौशालाओं में हजारों पशु मर चुके हैं। नर्मदा नदी सूखी पड़ी है। लोग नींबू पानी बनाकर पीते हैं, लेकिन चीनी भी महंगी  गोरखपुर में पूर्वांचल का पारा 44 डिग्री पार। बाढ़ के बाद अब गर्मी की बारी। कुशीनगर रोड पर झोपड़पट्टी में रहने वाली सुनीता कहती हैं, बच्चे रोते रहते हैं, ठंडक नहीं मिलती। नदी में नहाते हैं, लेकिन पानी गर्म। मजदूर ईंट भट्ठों पर काम करते हैं, लेकिन दोपहर बंद। अस्पतालों में सांप के काटने के साथ हीट स्ट्रोक के केस बढ़े। किसान धान की नर्सरी डालने से हिचक रहे हैं। पशु पानी के टैंकरों पर निर्भर।अलीगढ़ और मुरादाबाद में भी यही हाल। अलीगढ़ में लॉक उद्योग ठप, मजदूर घरों में कैद। मुरादाबाद की गलियों में चमड़े के कामगार पसीने से लथपथ। हर जगह गरीब जनमानस घरेलू नुस्खों पर जी रहा है। गुलकंद खाना, प्याज का रस पीना, सिर पर ठंडा पानी डालना। बच्चे मिट्टी में लोटते हैं, ठंडक के लिए। महिलाएं रात भर जागती हैं, पति को ठंडा पानी पिलाती हैं। बुजुर्ग दुआ मांगते हैं, बारिश की। कुल मिलाकर इस गर्मी ने उत्तर प्रदेश को भट्टी बना दिया है। गरीबों के पास न कूलर, न फ्रिज, बस इरादे की ठंडक। वे गीले कपड़े पहनते हैं, छाया तलाशते हैं, नमक चाटते हैं। लेकिन हद पार हो रही है। सरकार को अब सक्रिय होना चाहिए।

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