वीरेंद्र बहादुर सिंह
भूलने की आदत वाले लोग ट्रेन या एयरपोर्ट पर अपना सामान भूल जाएं, यह तो ठीक है, लेकिन जब वे अपने बैंक अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट या बीमा पालिसी में भी नामिनी का नाम लिखना भूल जाते हैं, तो इसे लापरवाही या अज्ञानता कहा जा सकता है। कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि उनकी बचत या निवेश की जानकारी किसी को न हो।पिछले साल जनवरी से अक्टूबर के बीच लगभग 580 भूलने वाले यात्रियों की ₹4.6 करोड़ की वस्तुएं रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स ने सुरक्षित रखीं और कई सामान उनके घर तक पहुंचाए। केवल मुंबई में ही पिछले साल यात्रियों ने ट्रेन या स्टेशन पर ₹2.28 करोड़ के बैग, पर्स, लैपटॉप जैसी चीजें भुला दीं। कई यात्री तो शिकायत भी नहीं करते, फिर भी रेलवे विभाग उन्हें ढूंढकर उनका सामान लौटा देता है।हाल ही का एक मामला ऐसा है कि रेलवे पुलिस को सायन स्टेशन से ₹10,000 नकद, एटीएम कार्ड और बैंक पासबुक के साथ एक बैग मिला। इसकी शिकायत करने कोई नहीं आया, लेकिन पासबुक में दिए पते के आधार पर रेलवे पुलिस जॉन पीटर नाम के एक वरिष्ठ नागरिक के घर पहुंच गई। अपना खोया हुआ बैग वापस पाकर उनकी आंखों में आंसू आ गए।लोग कभी जल्दबाजी में, तो कभी बातचीत में उलझकर चीजें भूल जाते हैं। जैसे रेलवे ‘आपरेशन अमानत’ चलाता है, वैसे ही बैंकों और बीमा कंपनियों को भी कुछ पहल करनी चाहिए। बैंक अकाउंट, एफडी या बीमा पालिसी में नामिनी का नाम न होने के कारण वारिसों को ढूंढने की कोशिश बहुत कम होती है।बैंकों और बीमा कंपनियों को करीब ₹2 लाख करोड़ की राशि के वारिस नहीं मिल पा रहे हैं। रिजर्व बैंक आफ इंडिया के डिपाजिटर्स एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड में सबसे ज्यादा बिना दावे की राशि पड़ी है। बैंक ईमानदार हैं, लेकिन नामिनी के बिना जमा कराने वालों तक पहुंचने के लिए आधुनिक तरीकों का इस्तेमाल नहीं करते। पिछले पांच वर्षों में ऐसी राशि बढ़ी है, तब सवाल उठता है कि बैंक बिना नामिनी के डिपाजिट क्यों स्वीकार करते हैं।
जब कोई व्यक्ति जमा करने आता है, तो फार्म सही तरह से भरवाने में लापरवाही होती है। यह भी जांच नहीं होती कि उस समय बैंक मैनेजर कौन था, फार्म किसने चेक किया, सीसीटीवी चालू थे या नहीं।read more:https://khabarentertainment.in/a-special-event-was-organised-on-the-occasion-of-ambedkar-jayanti-baisakhi-and-jallianwala-bagh-memorial-day/रिजर्व बैंक का कहना है कि बिना दावे की राशि कहीं जाने वाली नहीं है। जो भी व्यक्ति उचित प्रमाण के साथ दावा करता है, उसे तुरंत पैसा दे दिया जाता है। इसी तरह ₹89,000 करोड़ के 166 करोड़ शेयर भी बिना दावे के पड़े हैं।कई लोग अपने परिवार से छुपाकर निवेश करते हैं, जिससे उनके निधन के बाद वारिसों को उस निवेश की जानकारी नहीं मिलती और वे दावा भी नहीं कर पाते। ऐसे शेयरों के लिए सात महीने तक इंतजार किया जाता है, फिर उन्हें आईईपीएफ में जमा कर दिया जाता है।बीमा पालिसियों में बिना दावे की राशि ₹10,915 करोड़ है और 31.67 लाख अकाउंट निष्क्रिय हैं। प्रोविडेंट फंड (ईपीएफ) में ₹10,900 करोड़ बिना दावे के पड़े हैं। कई बार नौकरी बदलने पर पुरानी कंपनी की राशि नए अकाउंट में ट्रांसफर नहीं होती, जिससे रिटायरमेंट के समय बचत का उपयोग नहीं हो पाता।हालांकि ईपीएफ की प्रणाली आनलाइन है, फिर भी वहां लालफीताशाही ज्यादा चलती है। लोगों का पेंशन नियमित जमा नहीं होता और परेशान होकर कई लोग अपनी राशि छोड़ देते हैं। यह विभाग शायद ही कभी खुद आगे बढ़कर कर्मचारियों की समस्याएं समझने की कोशिश करता है।लोग भूल करते हैं, लेकिन बैंकों और अन्य विभागों को भी यह सुनिश्चित करने के लिए सकारात्मक प्रयास करने चाहिए कि बिना दावे की राशि सही वारिसों तक पहुंच सके।read more:https://khabarentertainment.in/jal-jeevan-mission-employees-protest-after-not-receiving-salaries-for-five-months/