विकास के बीच रोज़गार और सुविधाओं की चुनौती

Share

पुष्पांजलि कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार

भारत, इस समय दुनिया के उन गिने चुने देशों में एक है जो तेजी से विकास की ओर अग्रसर है। लेकिन विडंबना यह है आज भी देश की एक बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है और अपनी जीविका के लिए कृषि तथा उससे जुड़े कार्यों पर निर्भर है। हालांकि पिछले कुछ दशकों में ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं में काफी सुधार हुआ है, फिर भी कई राज्यों में यह सुविधाएँ आज भी शत प्रतिशत उपलब्ध नहीं हो पाई हैं।बिहार उन राज्यों में शामिल है, जहाँ ग्रामीण विकास के क्षेत्र में प्रगति तो हुई है, लेकिन अभी भी कई चुनौतियाँ मौजूद हैं। बिहार की लगभग 88.7 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है और इनमें से अधिकांश लोग कृषि या दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं। यहां बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को देखें तो पहले की तुलना में काफी सुधार देखने को मिला है। राज्य में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लाखों गरीब परिवारों को पक्का घर मिला है। हाल के वर्षों में देश भर में चार करोड़ से अधिक पक्के मकान बनाए गए हैं, जिनमें लगभग 57 लाख घर बिहार में बनाए गए हैं।इसके अलावा पिछले दस वर्षों में बिहार में लगभग 55,000 किलोमीटर ग्रामीण सड़कों का निर्माण हुआ है, जिससे गांवों को शहरों से जोड़ने में काफी मदद मिली है। इसी तरह ‘हर घर नल का जल’ योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की सुविधा भी तेजी से बढ़ी है और कई जिलों में 90 प्रतिशत से अधिक घरों तक नल का पानी पहुँच चुका है। इन सुविधाओं ने ग्रामीण जीवन को पहले की तुलना में बेहतर बनाया है, लेकिन इन सुधारों के बावजूद आज भी कई गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्थायी रोजगार की कमी बनी हुई है।ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध नहीं हो पाई हैं? इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे पहला कारण है अत्यधिक जनसंख्या और सीमित संसाधन। बिहार देश के सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व वाले राज्यों में से एक है, जहाँ संसाधनों पर दबाव अधिक है। दूसरा औद्योगिक विकास की कमी। राज्य में बड़े उद्योगों की संख्या बहुत कम है, जिसके कारण स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सीमित हैं। अधिकतर लोग खेती या दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर रहते हैं, जिससे उनकी आय बहुत कम होती है। तीसरा कारण है भूमि का छोटा और बिखरा हुआ स्वरूप। बिहार में लगभग 91 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत किसान हैं, जिनके पास बहुत कम जमीन होती है, जिससे उनकी आय पर्याप्त नहीं हो पाती। इन सभी कारणों के कारण गरीबी और बेरोजगारी की समस्या लगातार बनी रहती है।read more:https://khabarentertainment.in/unidentified-people-set-fire-to-two-vehicles-and-a-hut-at-night/गरीबी और रोजगार की कमी का सबसे बड़ा असर बच्चों और विशेषकर लड़कियों की शिक्षा पर पड़ता है। जब परिवार की आमदनी कम होती है और घर चलाने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं होते, तब माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल से निकालकर मजदूरी में लगा देते हैं। यह स्थिति केवल बिहार तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्सों में यह समस्या देखी जाती है। कई ग्रामीण परिवारों में बच्चों को खेतों में काम करने, ईंट-भट्टों में मजदूरी करने या छोटे-मोटे कामों में लगा दिया जाता है। इससे उनका भविष्य प्रभावित होता है और वे शिक्षा से वंचित रह जाते हैं।हालाँकि यह भी सच है कि पहले की तुलना में बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की गति तेज हुई है। बिजली की उपलब्धता बढ़ी है, शौचालय निर्माण में तेजी आई है और स्कूलों तथा आंगनबाड़ी केंद्रों की संख्या भी बढ़ी है। सरकार की विभिन्न योजनाओं जैसे प्रधानमंत्री आवास योजना, स्वच्छ भारत मिशन, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और मनरेगा (अब नया नाम वीबी जी राम जी) ने ग्रामीण जीवन को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके तहत बिहार में लगभग 51 लाख परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया गया है, जिससे ग्रामीण गरीबों को कुछ हद तक आर्थिक सहायता मिली है। इसके बावजूद स्थायी और बेहतर आय वाले रोजगार के अवसर अभी भी सीमित हैं, जिसके कारण गरीबी की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।देश और राज्य स्तर के आंकड़ों को देखें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है। नीति आयोग के अनुसार बिहार में बहुआयामी गरीबी की दर वर्ष 2015-16 में लगभग 51.89 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2019-21 तक घटकर लगभग 33.76 प्रतिशत हो गई है। यह कमी विकास के प्रयासों को दर्शाती है, लेकिन यह भी दर्शाती है कि अभी भी राज्य की एक बड़ी आबादी गरीबी में जीवन जी रही है। इसी तरह रोजगार के आंकड़ों के अनुसार बिहार में युवाओं के बीच बेरोजगारी की दर 23 प्रतिशत से अधिक पाई गई है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।read more:https://khabarentertainment.in/retired-teachers-were-given-a-warm-farewell-at-the-felicitation-ceremony-their-services-were-remembered/
इन समस्याओं का समाधान केवल सरकारी योजनाओं की घोषणा से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन से संभव है। सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, ताकि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकें। इसके लिए खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मधुमक्खी पालन, मछली पालन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए। इसके साथ ही कौशल विकास योजनाओं को मजबूत बनाना जरूरी है, ताकि युवा आधुनिक तकनीकों के अनुसार प्रशिक्षित हो सकें और बेहतर रोजगार प्राप्त कर सकें। जिसके लिए स्कूली स्तर पर ही रोजगारपरक पाठ्यक्रम चलाने की जरूरत है ताकि शिक्षा और हुनर एक साथ विकसित हो सके।पिछले कुछ दशकों में बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में उल्लेखनीय विकास हुआ है, फिर भी स्थायी रोजगार और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कमी के कारण गरीबी की समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है। यदि सरकार, समाज और स्थानीय समुदाय मिलकर योजनाओं को सही तरीके से लागू करें और ग्रामीण युवाओं को कौशल व रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएं, तो आने वाले वर्षों में बिहार के गांव आत्मनिर्भर बन सकते हैं और बच्चों को मजदूरी के बजाय शिक्षा का उज्ज्वल भविष्य मिल सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *