ईरान युद्ध की भारतीयों पर असर : गैस की कमी से लेकर वतन वापसी तक

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वीरेंद्र बहादुर सिंह 
अमेरिका और ईरान के बीच 28 फरवरी, 2026 को युद्ध की शुरुआत हुई थी। अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हवाई हमले किए थे और युद्ध शुरू हुआ था। इसे आपरेशन एपिक क्यूरी नाम दिया गया था। इसके बाद स्थिति ऐसी हो गई कि ईरान ने हॉर्मुज की खाड़ी बंद कर दी। इसके कारण एशिया और यूरोप के देशों का कच्चे तेल और गैस की सप्लाई बाधित हो गई। दूसरी ओर खाड़ी देशों और यूरोप के देशों में जाने वाला भारतीय सामान भी अटक गया। हॉर्मुज की खाड़ी बंद होने के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल और गैस की कमी हो गई। अब 38 दिन तक चले इस युद्ध में कल अमेरिका और ईरान ने युद्धविराम की घोषणा की। 14 दिन के युद्धविराम के बाद दुनिया में इसकी सकारात्मक असर देखने को मिला है।फिलहाल युद्धविराम की घोषणा की गई है। सामान्य रूप से देखें तो दुनिया के लिए यह अच्छे समाचार हैं। खासकर दुनिया भर में कच्चे तेल और गैस की जो कमी पैदा हुई है, उसमें राहत मिलने की संभावना है। जानकारों के अनुसार इस युद्ध के कारण खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों और भारत के अपने नागरिकों पर व्यापक रूप से नकारात्मक असर पड़ा है। भारत में पेट्रोल, डीजल और गैस की कमी के बीच कई लोगों का बजट बिगड़ गया। घर चलाना, छोटे व्यापार और रोजगार चलाना मुश्किल हो गया, कई शहरों और शहरी क्षेत्रों में रहने वाले मजदूरों को गैस सिलेंडर की कमी के कारण वतन लौटना पड़ा। इसी तरह खाड़ी देशों में रहने वाले एनआरआई भारतीयों, वहां के मजदूर भारतीयों को भी वतन वापस आना पड़ा। कई देशों में लोगों को वतन लौटने का मौका नहीं मिला और दूसरी ओर वहां रोजगार भी बंद हो गए, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका और ईरान द्वारा 14 दिन का युद्धविराम घोषित किया गया है। अमेरिका और इजराइल द्वारा फिलहाल ईरान पर कोई हमले नहीं किए जाएंगे। इसके बदले में हॉर्मुज की खाड़ी का रास्ता खोला जाएगा, ऐसा तय किया गया है। जहाजों की आवाजाही पहले की तरह सामान्य करने की बात कही गई है। इस दिशा में ईरान ने भी कुछ शर्तें रखी हैं। इन सभी मुद्दों पर 10 अप्रैल को चर्चा होगी। कथित तौर पर पाकिस्तान द्वारा मध्यस्थता की गई है और इस्लामाबाद में बैठक होने वाली है। बैठक में क्या तय होगा, यह तो आने वाला समय बताएगा, लेकिन पिछले 38 दिन भारत सहित दुनिया के कई देशों के लिए बहुत कठिन साबित हुए हैं।पिछले 38 दिनों का लेखाजोखा देखें, तो अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर हमला किया और युद्ध शुरू हुआ। इसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई के साथ रणनीतिक हमले भी शुरू कर दिए। उसने सबसे पहले हॉर्मुज की खाड़ी बंद कर दी। जिस रास्ते से दुनिया का 30 प्रतिशत कच्चा तेल और गैस गुजरता था, वही समुद्री मार्ग बंद कर दिया गया। इसके चलते हजारों जहाज वहां फंस गए और लाखों बैरल कच्चा तेल अटक गया। इसके कारण कच्चे तेल की कीमत 72 डालर प्रति बैरल से बढ़कर सीधे 114 डालर प्रति बैरल तक पहुंच गई।कच्चा तेल महंगा होने के कारण कई देशों में महंगाई तेजी से बढ़ गई। भारत में भी कच्चे तेल की कमी की अफवाहें फैली थीं, लेकिन स्थिति नियंत्रण में आ गई थी। दूसरी ओर बांग्लादेश, पाकिस्तान, फिलीपींस, वियतनाम, अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी हुई।इसके अलावा पश्चिम के कई देशों में पेट्रोल राशनिंग के आधार पर बेचा जाने लगा। भारत में भी कई समस्याएं सामने आईं।read more:https://khabarentertainment.in/police-launched-mission-shakti-5-0-campaign-women-and-girls-were-informed-about-their-safety-and-rights
भारत में सबसे पहले रसोई गैस की कमी होने लगी। एलपीजी का स्टॉक कम हो गया और सप्लाई में कठिनाई आने लगी। दिल्ली में रसोई गैस 900 रुपए में मिलती थी, उसका कालाबाजारी शुरू हो गई। वह चार गुना कीमत यानी 3600 रुपए तक बिकने लगी।कामर्शियल गैस भी 5 से 6 हजार तक पहुंच गई। बेंगलुरु, पुणे, चेन्नई जैसे क्षेत्रों में तो गैस 7000 से 9000 रुपए तक बिकने लगी थी। सरकार ने तुरंत कदम उठाए। कालाबाजारी पर लगाम लगाने की कोशिश की गई। हालांकि एलपीजी के लिए लंबी कतारें लगने लगीं।सरकार को तुरंत आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू करना पड़ा। होटल और रेस्टोरेंट के व्यवसाई फंस गए। जिनके पास गैस का स्टॉक था, उन्होंने काम जारी रखा, बाकी रोज कमाने वाले लोगों को काम बंद करना पड़ा। कई रेस्टोरेंट के मेन्यू छोटे हो गए। इंडक्शन चूल्हों की खरीद में अचानक लगभग 30 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।भारत में पेट्रोल और डीजल की कमी की अफवाहें फैलने लगी थीं। इसके कारण गुजरात में तीन-तीन दिन तक पेट्रोल पंपों पर हजारों लोगों की लाइनें लगी थीं। भारत ने किसी तरह पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रण में रखा, फिर भी निजी कंपनियों ने 5 से 10 रुपए तक की बढ़ोत्तरी कर दी। दूसरी ओर एयरलाइंस कंपनियों ने टिकट के दाम बढ़ा दिए। एयर इंडिया ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर 299 से 899 रुपए तक का बढ़ोत्तरी कर दी।भारत में खेती और खाद्य पदार्थों पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिला। भारत में 40 प्रतिशत यूरिया और फॉस्फेट युक्त खाद खाड़ी देशों से आता है। हॉर्मुज की खाड़ी बंद होने से उसका सप्लाई रुक गई। इसके चलते भारत के तीन बड़े यूरिया प्लांटों को अपनी उत्पादन गति धीमी करनी पड़ी। इसके कारण खेतों में खाद की कमी होने लगी। दूसरी ओर ईरान से आने वाले 23 प्रतिशत सेब और 39 प्रतिशत बादाम का आयात भी रुक गया। इसके अलावा खाड़ी देशों में भेजे जाने वाले केले कंटेनरों में ही फंसकर सड़ गए। कोलकाता और कोच्चि में चाय का स्टॉक गोदामों में पड़ा रह गया। रुपया भी कमजोर हुआ, जिससे विदेश से आयात की जाने वाली दाल 15 प्रतिशत महंगी हो गई।सबसे बड़ेअसर की बात करें तो खाड़ी देशों में काम करने वाले लगभग 90 लाख से 95 लाख भारतीय फंस गए थे। वे हर साल लगभग 50 अरब डालर से अधिक राशि भारत भेजते हैं।इस पैसे से करोड़ों भारतीय परिवारों का जीवन चलता है। बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों का इलाज और घर के खर्च इसी पर निर्भर होते हैं, जो प्रभावित हो गए। मार्च में ही लगभग 2.70 लाख भारतीय वतन लौट आए थे।read more:https://khabarentertainment.in/awarded-for-outstanding-contribution-in-the-field-of-women-empowerment/
दूसरी ओर लाखों लोग अभी भी वतन लौटने का इंतजार कर रहे हैं। केरल पर इसका सबसे ज्यादा असर देखा गया है। राज्य की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों की कमाई पर निर्भर है। इसमें भारी कमी आई। अन्य राज्यों में रहने वाले श्रमिक परिवारों पर भी इसका असर पड़ा है।अमेरिका-ईरान का युद्धविराम कितना टिकेगा, इस पर दुनिया की नजर है। महत्वपूर्ण बात यह है कि हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम हुआ है। ईरान ने घोषणा की है कि सभी जहाज हॉर्मुज की खाड़ी के रास्ते आ-जा सकते हैं। इसके लिए तत्काल समन्वय प्रक्रिया शुरू की गई है।विशेषज्ञों का मानना है कि रास्ता पूरी तरह से अभी नहीं खुला है, फिर भी जो कदम उठाए गए हैं, उससे दुनिया को राहत मिल सकती है। एक बार टैंकरों की आवाजाही शुरू हो जाएगी तो सप्लाई चेन फिर से जुड़ सकती है। यदि इस युद्धविराम के दौरान बातचीत से कोई सकारात्मक निर्णय निकलता है और युद्ध समाप्त घोषित किया जाता है, तो भी बाजार पर उसका असर दिखने में कई महीने लगेंगे।कच्चे तेल के बाजार को सामान्य होने में कई महीने लगेंगे। बंदरगाहों पर फंसे टैंकर और खाद्य सामग्री से भरे कंटेनरों की आवाजाही शुरू करनी होगी। बीमा कंपनियों को फिर से कवर देना होगा, जिससे शिपिंग लागत कम होगी।एलपीजी की सप्लाई सामान्य होने में भी समय लगेगा। कच्चे तेल की कीमत घटेगी तो पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें भी नियंत्रण में आएंगी। कच्चे तेल की कीमत 80 डालर तक आने की संभावना जताई जा रही है।हालांकि अभी युद्ध समाप्त होने की घोषणा नहीं हुई है। चिंता यह भी है कि युद्धविराम जल्दी खत्म हो सकता है। इजराइल हमले किए बिना नहीं रहेगा और ईरान की शर्तें अमेरिका के लिए कठिन हो सकती हैं। ईरान चाहता है कि उसे नुकसान का आर्थिक मुआवजा दिया जाए और यूरेनियम रखने की अनुमति दी जाए। अमेरिका और इजराइल इतनी आसानी से इन शर्तों को मानेंगे, ऐसा नहीं लगता।फिलहाल हॉर्मुज की खाड़ी का खुलना भारत और एशिया के अन्य देशों के लिए अच्छी खबर है। एलपीजी की कमी कम होगी और कच्चे तेल की कीमत घटने से पेट्रोल और डीजल के दाम भी कम हो सकते हैं।एक बात स्पष्ट है कि पिछले 38 दिनों में भारत सहित दुनिया के कई देशों को जो कठिनाइयां झेलनी पड़ीं, उसकी भरपाई किसी भी मुआवजे से संभव नहीं है।read more:https://khabarentertainment.in/three-blood-donors-donated-blood-on-behalf-of-jai-ambe-blood-donation-committee-

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