तनवीर जाफ़री अमेरिका व इस्राईल द्वारा संयुक्त सैन्य अभियान चलाकर ईरान पर थोपे गये बलात युद्ध को पांच सप्ताह बीत चुके हैं। पूरी दुनिया में अपनी फ़ज़ीहत होती देख राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने अब खिसियाहट में ईरान के आधारभूत ढांचों को नुक़्सान पहुँचाना शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में अमेरिका ने पिछले दिनों ईरान की राजधानी तेहरान और कराज़ को जोड़ने के लिए बनाये जा रहे राजधानी के सबसे ऊँचे सस्पेंशन ब्रिज को ध्वस्त कर दिया। लगभग 1 किलोमीटर से अधिक लंबे और 136 मीटर ऊँचे इस निर्माणाधीन हाई‑राइज़ ब्रिज पर पिछले दिनों अमेरिका और इज़राइल ने मिलकर दो बार एयरस्ट्राइक की। इन हवाई हमलों के परिणामस्वरूप पुल का बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया। इस हमले में कम से कम 8 लोग मारे गए और 100 से अधिक घायल हुए। इस हमले के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर इस पुल के ढहते हुए वीडियो शेयर कर ईरान को धमकी देते हुये लिखा कि “डील कर लो, वरना बहुत देर हो जाएगी”। उन्होंने लिखा कि अगर ईरान ने अपना रुख़ नहीं बदला तो “उस देश में कुछ भी नहीं बचेगा जो कभी महान देश बन सकता था,”। ट्रंप ने इस हमले को “अमेरिकी सेना की ताक़त का छोटा नमूना” बताया और यह संकेत दिया कि अगर ईरान डील से मना करता है तो देश के पावर प्लांट, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क आदि अन्य इंफ़्रास्ट्रक्चर भी अगले निशाने हो सकते हैं। इसी अमेरिका ने युद्ध की शुरुआत में 28 फ़रवरी को ही ईरान के मिनाब शहर में शजारेह तैय्येबह बालिका प्राथमिक स्कूल की ईमारत पर टॉमहॉक मिसाइल मिसाइल से हमला कर लगभग 175 लोगों को शहीद कर दिया था इनमें अधिकांश स्कूल की बच्चियां शामिल थीं। स्कूल के पास ही दवाख़ाना व अन्य नागरिक सुविधाएं भी थीं। इसी हमले के चलते न केवल ईरान ने अमेरिका को युद्ध अपराध का दोषी ठहरा दिया था बल्कि दुनिया भर में भी इसे “युद्ध अपराध” क़रार दिया गया। ग़ौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के मूल सिद्धांतों के तहत जिनेवा कन्वेंशन्स 1949 व इसके एडिशनल प्रोटोकॉल्स 1977 के अंतर्गत युद्ध में रिहाइशी इलाक़ों,स्कूलों, अस्पताल, पानी की व्यवस्था संबंधित प्लांट्स, बिजली ग्रिड,पुल जैसे बुनियादी ढांचों पर हमले सामान्यतः नहीं किए जा सकते। ये युद्ध अपराध माने जाते हैं। युद्ध में लड़ाई के दौरान सैनिकों,सैन्य लक्ष्यों और नागरिकों व नागरिक सुविधा संबंधी वस्तुओं के बीच स्पष्ट अंतर करना ज़रूरी है। परन्तु अमेरिका तो क्या उसकी शह व संरक्षण में युद्धरत इस्राइल को भी न तो मानवीय क़ानून की फ़िक्र है न ही जिनेवा कन्वेंशन्स में निर्धारित युद्ध के सिद्धांतों की। इसीलिये अपनी अपार शक्ति व सर्वोच्चता के नशे में चूर अमेरिका व उसके पिछलग्गू इस्राईल द्वारा हर संभव युद्ध अपराध किया जा रहा है। गज़ा में तो नेतन्याहू के नेतृत्व में इस्राईल ने दरिन्दिगी का वह इतिहास रचा है जिसने युद्ध अपराध की सभी सीमाओं को पार कर दिया है। सरकारी आंकड़े बताते है कि 7 अक्टूबर 2023 से 25 मार्च 2026 तक इस्राईली सेना द्वारा 72,265 फ़िलिस्तीनी मारे जा चुके हैं जबकि 1,71,959 लोग घायल हुए। यहाँ तक कि 10 अक्टूबर 2025 को लागू हुये युद्धविराम के बाद भी इस्राईल ने लगभग 700 लोगों को मार दिया है। हालाँकि कुछ स्वतंत्र अध्ययन कुल मौतों का आंकड़ा 75,000 से ज़्यादा बता रहे हैं। स्वयं इस्राइली सेना ने जनवरी 2026 में 70,000 मौतों का आंकड़ा स्वीकार किया था। कुल लगभग 22-23 लाख की आबादी वाले इस इलाक़े में 19 लाख से ज़्यादा लोग एक या कई बार विस्थापित हुए हैं। नतीजतन आज भी 17 लाख से ज़्यादा लोग अस्थायी विस्थापन कैंप्स में रह रहे हैं। इनमें से ज़्यादातर लोगों के घर-मकान नष्ट हो चुके हैं जिसके चलते लोग बेघर हैं। नेतन्याहू के इशारों पर यह हत्याएं घने रिहायशी इलाक़ों,स्कूल्स,बाज़ार,अस्पताल,