जेनेरिक से नवाचार तक का सफर

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कोविड-19 महामारी ने इस निर्भरता की वास्तविकता को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया। चीन में लॉकडाउन के कारण आपूर्ति बाधित होते ही भारत में दवा उत्पादन प्रभावित हुआ। अनेक औषधि निर्माण इकाइयों को उत्पादन घटाना पड़ा और कुछ को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। इससे यह स्पष्ट हो गया कि कच्चे माल की आपूर्ति में व्यवधान भारत की औषधि उत्पादन क्षमता को तुरंत प्रभावित कर सकता है। इस अनुभव ने आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को और अधिक प्रासंगिक बना दिया। इसी संदर्भ में सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना के माध्यम से लगभग 16,000 करोड़ रुपये के निवेश की घोषणा की, जिसका उद्देश्य घरेलू स्तर पर सक्रिय औषधीय संघटकों के उत्पादन को बढ़ावा देना है। यद्यपि इस दिशा में कुछ प्रगति हुई है, फिर भी अनेक संरचनात्मक समस्याएं अब भी बनी हुई हैं। उच्च उत्पादन लागत, तकनीकी सीमाएं तथा कठोर पर्यावरणीय नियमों के कारण कई उत्पादन इकाइयां बंद हो चुकी हैं, जिससे घरेलू उत्पादन क्षमता सीमित हो गई है।  नियामक ढांचे की कमजोरी भी इस क्षेत्र की एक प्रमुख चुनौती है। केंद्रीय और राज्य स्तर पर औषधि नियंत्रण संस्थाओं में संसाधनों और प्रशिक्षित मानवबल की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। गुणवत्ता नियंत्रण में खामियों के कारण कई भारतीय औषधि निर्माण इकाइयों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना का सामना करना पड़ा है। कुछ मामलों में विदेशी नियामक संस्थाओं द्वारा आयात प्रतिबंध भी लगाए गए हैं, जिनका कारण निर्माण प्रक्रियाओं में त्रुटियां और गुणवत्ता मानकों का उल्लंघन रहा है। इससे भारत की वैश्विक साख प्रभावित होती है और निर्यात संभावनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

 

इसके अतिरिक्त, नकली दवाओं का बढ़ता बाजार भी एक गंभीर समस्या के रूप में उभर रहा है। यह न केवल उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा है, बल्कि औषधि उद्योग की विश्वसनीयता को भी कमजोर करता है। मूल्य नियंत्रण नीतियों के कारण कंपनियों की लाभप्रदता सीमित होती है, जिससे वे अनुसंधान एवं विकास में पर्याप्त निवेश नहीं कर पातीं और मुख्यत: जेनेरिक उत्पादन तक ही सीमित रह जाती हैं। अनुसंधान एवं विकास में निवेश की कमी भारतीय औषधि क्षेत्र की एक बड़ी कमजोरी है। जहां वैश्विक औषधि कंपनियां अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा अनुसंधान पर खर्च करती हैं, वहीं भारत में यह अनुपात अपेक्षाकृत कम है। इसका परिणाम यह है कि भारत नवाचार आधारित दवाओं, जैविक औषधियों और व्यक्तिगत चिकित्सा जैसे उभरते क्षेत्रों में पीछे रह जाता है। भविष्य में इन क्षेत्रों का महत्व तेजी से बढऩे वाला है, और यदि भारत ने समय रहते इस दिशा में निवेश नहीं बढ़ाया, तो वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकता है। कौशल विकास की कमी भी एक महत्वपूर्ण बाधा के रूप में सामने आती है। आधुनिक औषधि निर्माण, जैव प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अनुसंधान के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन की आवश्यकता है, जो वर्तमान में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। शिक्षा संस्थानों और उद्योग के बीच समुचित समन्वय के अभाव में छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता, जिससे नवाचार की गति प्रभावित होती है। पर्यावरणीय चुनौतियां भी इस क्षेत्र को प्रभावित कर रही हैं। औषधि निर्माण प्रक्रिया ऊर्जा-गहन और प्रदूषणकारी होती है, जिसके कारण पर्यावरणीय मानकों का पालन करना महंगा पड़ता है। इससे उत्पादन लागत बढ़ती है और प्रतिस्पर्धात्मकता घटती है। साथ ही, डिजिटल प्रौद्योगिकी के सीमित उपयोग के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और गुणवत्ता निगरानी में भी बाधाएं उत्पन्न होती हैं।

 

इन चुनौतियों से निपटने के लिए एक समग्र, संतुलित और दीर्घकालिक रणनीति अपनाना आवश्यक है। सबसे पहले, घरेलू स्तर पर सक्रिय औषधीय संघटकों के उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। इसके लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं का विस्तार तथा औद्योगिक क्लस्टरों का विकास किया जाना चाहिए। छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहित करके उन्हें इस क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी के लिए सक्षम बनाना होगा। दूसरा, अनुसंधान एवं विकास को प्राथमिकता देते हुए सरकार को कर प्रोत्साहन बढ़ाने और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को मजबूत करने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग से औषधि खोज प्रक्रिया को अधिक तेज और प्रभावी बनाया जा सकता है। तीसरा, नियामक सुधारों को लागू करना अत्यंत आवश्यक है। औषधि नियंत्रण संस्थाओं को अधिक संसाधन, तकनीकी क्षमता और स्वायत्तता प्रदान करनी होगी। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से गुणवत्ता निगरानी और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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