तवानदी,नर्मदानदी, या कोई भी लहलहाती नदी के किनारों पर डंगरवाड़ी की खेती का प्रिय फल खरबूज, तरबूज ओर खीरा देशव्यापी ख्याति अर्जित कर चुके है। क्या गरीब क्या अमीर हर व्यक्ति तरबूज का दीवाना है ओर तरबूज अपने रूप रंग आकार-प्रकार ही नहीं बल्कि वजन में सबसे भारी होता है। तरबूज पर सभी लट्टू हो जाते है इसीलिए उसे खरीदने से खुद को नहीं रोक सकते है। माना जाता है कि आदमी तरबूज तीन कारणों से खरीदता है। एक तो रूप रंग आकार-प्रकार में तरबूज अपने आप में एक भरा पूरा परिवार है ओर परिवार का पेट भर देता है। दूसरे, जब भी किसी बात से दिमाग गरम हो जाये तब तरबूज खाकर गर्मी दूर की जा सकती है, या किसी भी पत्रकार का तरबूज जैसा भारी भरकम लेख-व्यंग्य, समाचार आदि पढ़ने से तनाव आ जाये तो उससे मुक्ति के लिए तरबूज की शीतलता आवश्यक हो जाती है ओर तीसरे, जब पत्रकार-साहूकार, सरकार आदि से अपनी मति मारी जाये? ये तीनों ही हादसों के आप या मैं कभी भी शिकार हो सकते है, मैं तो अक्सर हादसों पर हादसों को झेलता रहा हूँ इसलिए मुझे तरबूज से गहरा प्रेम हो गया है ओर जब भी जहां भी तरबूज का ढेर सड़क के किनारे देखता हूँ तो मेरे पैर रुक जाते है, गाड़ी से होने पर गाड़ी के ब्रेक लग जाते है। पुलिस लाइन के पास दोनों ओर तरबूज़ों का ढेर देखकर में ठिठका, कई महीनों बाद मामा जी के घर बस से गाँव जा रहा हूँ, पेट्रोल पंपों पर गाड़ियों की लाइन लगी होने से मैं लिफ्ट लेकर आया था पर जाते समय पैदल ही लौटा, जिस मित्र ने पेट्रोल से भरा वाहन उपलब्ध करने की कहकर लौटकर आने को कहा, वह गधे के सिर से सींग की तरह गायब था , इधर मै अपने मामा के यहाँ जाने का मन होने पर उनके परिवार के लिए कुछ ले चलने का विचार ला चुका था ओर तरबूज ले चलने का मन हुआ ओर एक तरबूज खरीदने रुक गया। नर्मदापुरम-तवा बांध के तरबूज की महिमा स्थानीय समाचार पत्र में पढ़ी थी, मेरी मति मारी गई ओर में पुलिस पेट्रोल पंप के सामने एक दुकानदार से बड़े-वजनी तरबूज की ओर इशारा कर पूछ बैठा- ‘ये तरबूज कितने का हैं?’
छह किलों से ज्यादा है, बोनी का समय है आप पहले ग्राहक है, इसलिए एक सौ रुपए दे दीजिये, दुकानदार ने तपाक से तरबूज को तराजू पर तौलते हुये जबाव दिया। मेरी मति में प्राणों का संचार हुआ, 20 रुपए किलों के भाव से ये 130 रुपए का होता है ये तीस रुपए कम मे दे रहा है, तो इसे घर ले जाना नही बल्कि ढ़ोना ही है। पर जब दाम पुंछ लिया तो टालने की नियत से मैंने कहा तुम लूटते हो 12 रुपए किलो तो पूरी दुनिया में बिक रहा है तुम्हें पचास रुपए से ज्यादा नहीं दूंगा, दुकानदार बोला साहब 12 रुपए के हिसाब से भी यह 65 रुपए का हो रहा है, बोनी के समय आए हो इसलिए खरीदी कीमत से कम पर भी पहले ग्राहक को देकर दिन अच्छा करना चाहता हूँ नही तो पूरा दिन खराब निकलेगा? असल में भारी भरकम तरबूज के वजन ढोने से बचने के लिए उसे 50 रुपया कहा ताकि वह न दे, लेकिन ये क्या दुकानदार ने मेरा हाथ थामते हुये 50 रुपए ही दे दीजिये, बोहनी का समय है, कहकर तरबूज मेरे हाथों में थमा दिया।’ ‘माफ करना, बाद में फिर कभी ले जाउंगा। मुझे ले जाने की समस्या है कोई कपड़ा या थैला भी मेरे पास नहीं। फिर कभी।’ ‘नहीं बाबू, तरबूज तो ले जाना ही पड़ेगा। बोहनी खराब मत करो। मर्द की जुबान एक।’ यह कहकर मेरा हाथ कुछ मजबूती से पकड़ते हुए उसने एक पालिथीन की थैली में तरबूज रखकर थमा दिया, मैंने टालने की मनसा से कहा मुझे दूर जाना है, यह पोलिथीन थैली फट जाएगी, अगर कपड़े का थैला होता तो ले जाता? दुकानदार भी तरबूज मुझे बेचने के लिए अपनी कमर कस चुका था , बस उसने तुरंत मैला-सा कपड़ा जिससे वह तरबूजों पर पड़ी धूल झाड़ता था, उठाकर उसमें तरबूज को लपेटकर इस तरह बांधा कि उसका ऊपरी छोर पकड़कर, जिस तरह से अरथी के आगे हांडी लटकाए कोई जाता हो, उस तरह से तरबूज को लटकाकर आसानी से ले जा सके, मेरी ओर बढ़ाते हुए बोला- ‘मर्द की जुबान एक। निकालो पचास रूपए’ और मुझे उस दुकानदार के सामने खुद को मर्द साबित करने के लिए पचास रुपए देकर तरबूज लेना पड़ा। एक हाथ में कुछ काफी किताब ओर जरूरी कागजात की फाइल थी ओर दूसरे हाथ में तरबूज को लटकाए चले जाने में मैं हास्यास्पद, मुर्ख, कंजूस और कार्टून दिखाई देने लगा। लोग अजीब नजरों से मुझे देख रहे थे और कोई वस्तु होती तो लोगों की नजरों से बचाकर ले जाई जा सकती थी। पर तरबूज को छुपाया तो जा नहीं सकता, हां, चाहें तो तरबूज के पीछे छुप सकते हैं। इस स्थिति से और हाथ दर्द से निजात पाने के लिए एक बार तो सोचा कि इसे फेंक ही दूं। पर पचास रुपए का नुकसान का ख्याल आते ही मैंने 10 रुपए देकर के सवारी आटो में साबर हुआ ओर बसस्टेंड पहुचा। बसस्टेंड नगरपालिका की रखी बेंचों में बैठी सवारी में खाली एक सीट पर मैं बैठ गया ओर दूसरी बेंच पर कुछ खाली जगह के एक हिस्से में तरबूज को रख दिया, दोनों पृथक बेंचों पर मेरे ओर तरबूज के बीच दूरियाँ हो गई मानों मेरा और तरबूज का कोई दूर का भी रिश्ता न हो। बस, आई तो तरबूज को लेकर जैसे ही मैंने बस में चढ़ने का प्रयत्न किया, भीड़ ने मुझे इस अंदाज से नीचे ढकेल दिया मानों कह रही हो, न आपके लिए जगह है और न ही आपके तरबूज के लिये। मैं जैसे तैसे बस में चढ़ सकता था किन्तु मेरा तरबूज छूट जाता, मैं जैसे तैसे बस में चढ़ भी गया तब तरबूज वहीं सीट पर छोडना पड़ा। बस के अंदर से खिड़की पर खड़ा होकर मैंने एक व्यक्ति को आवाज दी, कृपया यह उठा देना। वह सज्जन व्यक्ति था मुझे घूरता हुआ जैसे ही तरबूज उठाने को हुआ कि बसस्टैंड पर घोषणा हुई कि ‘यात्रियों को सूचित किया जाता है कि किसी अनजान वस्तु को न छुएं। आपत्तिजनक वस्तु दिखे तो तुरंत स्टेशन मास्टर को सूचित करें।’ कोई भी अंजान वस्तु बम या विस्फोटक सामग्री हो सकती है, घोषणा सुनते ही वह सज्जन तरबूज को वहीं छोड़ मुझे घूरता हुआ चला गया। मैं भी तरबूज को ‘तेरा-मेरा यहीं तक साथ था’ की नजरों से देखता हुआ एक ठंडी सांस भर ही रहा था कि वह आदमी दो पुलिसवालों को लेकर आया और मेरी और इशारा करते हुए कहा- ‘साब, यही है वह आदमी’। पुलिस ने एक नजर मुझ पर, फिर एक नजर कपड़े में लिपटे मेरे गोल-मटोल तरबूज पर डाली और पलक झपकते ही मुझे बस से उतारकर तरबूज के पास खड़ा कर दिया। बस मुझे किसी खूंखार आतंकवादी की तरह अकेला छोड़ अपनी मंजिल की ओर सरकने लगी। पुलिस वाले ने जमीन पर डंडा पटकते हुये पूछा ‘इसमें क्या हैं?’ मैंने कहा, जी तरबूज है ,खोलकर दिखाऊ? मैंने जैसे ही तरबूज का कपड़ा खोलने हेतु हाथ बढ़ाया, पुलिसवाला चीखा नहीं नहीं, यह तरबूज नहीं मुझे शक है कि यह बम है ,यहा बिलकुल न खोलिए पुलिस थाने में आपकी खातिरदारी होगी ओर थानेदार खुद बम एक्सपर्ट को बुलवाकर देख लेंगे?वे मुझे पुलिस चौकी ले गए, एक हाथ में फाइल ओर एक हाथ में तरबूज जो शवयात्रा में आगे चलने वाली हांडी कि तरह दिख रहा था, लेकर चलने लगा ओर उस घड़ी को कोसने हुये जिसमें यह तरबूज खरीदा था, पुलिस चौकी पहुंचा जहा बहुत से पुलिसवालों ने मुझे घेरा बनाकर थानेदार के पास ले गए, ओर मुझे आतंकवादी समझ शक कि नजर से मुझे घूरते हुये तरबूज कि ओर देखते हुये थानेदार गुर्राया –तो इस पोटली में तरबूज है। खरीदकार लाये हो तो इसकी रसीद ली होगी।रसीद तो बता सकते हो? साहब, तरबूज वाला कोई भी रसीद नहीं रखता है इसलिए रसीद लेने ओर बताना, कैसे संभव होगा? हूँ , थानेदार ने सवाल दागा बिना रसीद के खरीदी कर सरकार को टेक्स का चूना लगाकर कानून बता रहा है। इसमें आर.डी.एक्स और बम क्यों नही हो सकता? अरे, कोई पढ़ा-लिखा और समझदार आदमी इस तरह कपड़े मे तरबूज बांधकर एक शहर से दूसरे गांव नहीं जाता। खैर, ये जिसे तुम तरबूज कह रहे हो, कहां से खरीदा? बंगलादेश से, पाकिस्तान से या दुबई से, अपनी शक की सुई से मेरी आंखें फोड़ते हुए। थानेदार ने कहा। मैंने कहा नहीं साहब भला बांग्लादेश, पाकिस्तान या दुबई से कोई तरबूज क्यों खरीदेगा?पाकिस्तान का पानी तो हमारे मोदी जी ने बंद कर दिया वहाँ सूखे के हालात है वह पानी कि कमी है,एसे ही दुबई में भी पानी नहीं होता इसलिए वहाँ तरबूज पैदा ही क्या होगा? अपने जिले में नर्मदा तवा पर सेकड़ों डंगरवाडी है जब यहा तरबूज कि कमी नही तो विदेश से तरबूज खरीदने का सबाल ही नही होता है? थानेदार ने गुस्से से कहाँ… हूँ ..तुझे .पाकिस्तान- दुबई कि ढेर सारी बाते पता है ओर वहाँ क्या पैदा होता है ओर क्या-क्या नहीं, कौन सा माल इम्पोर्ट होता है ओर कौन सा एक्सपोर्ट होता है सबकी जानकारी रखते हो । बताओं कितनी बार पाकिस्तान ओर दुबई गए, क्या बीजा पासपोर्ट बनवाया या नकली दस्तावेजों से विदेशी यात्राओं का मजा लूट रहे हो … मैंने घबराते हुये कहा नहीं साहब मैं लोकल का हूँ देश विदेश कि जानकारी तो समाचार पत्रों ओर टीव्ही तथा नेट से मिल जाती है, यह सब कामनसेंस कि बात है, …। थानेदार ने व्यंग्य के लहजे में कहा तो तुम्हारा कहना है कि हममें कामनसेंस नहीं है। नहीं साब, ऐसी बात नहीं। आप तो बुद्धिमान हैं, पर मैं….. मेरा मतलब……… मुझसे तरबूज खरीदने की मूर्खता हुई है। मुझे माफ कर दो। ये बम-वम कुछ नहीं सिर्फ तरबूज है। चाहों तो इसे काटकर इसके टुकड़े करके देख सकते हो कि ये तरबूज ही हैं।’ अबकी बार कुछ रूआंसा होते हुए मैंने कहा। थानेदार गरजा -‘चुप रहो। आँसू दिखाकर मेरा दिल पसीजने वाला नहीं है उल्टे तरबूज के टुकड़े-टुकड़े करके सबूत मिटाना चाहते हो? पुलिस के आला अधिकारियों को खबर दे दी गई है देखे वे क्या एक्शन लेते है। थानेदार ने मोबाइल पर नंबर लगाया।‘हलो साब, मैं स्टेशन चौकी का थानेदार बोल रहा हूं, साब, एक केस आया है एक गोल-मटोल बड़ी सी वस्तु कपड़े में लिपटी हुई बरामद की है। जिसकी है वह इसे तरबूज बता रहा है। हमने अभी कपड़ा हटाया नहीं……. जी, आदमी , आदमी तो शरीफ मालूम होता है, पर पाकिस्तान-दुबई के बारे में कुछ-कुछ जानता है…… हां, अगर उसके साथ सख्ती की जाये तो वह पाकिस्तान ओर दुबई मे किससे मिलता था ओर क्या करता था बता देगा, सर मुझे शक है की ये जासूस हो सकता है जो देश की फाइलें दुश्मन देशों का बेचता होगा । हाँ सर शक्ल से वह जासूस नजर आता है ओर खुद को लेखक व्यंग्यकर ओर पत्रकार भी बता रहा है , उसे बसस्टैंड से पकड़ा है। क्या जप्त किए गए थैली को खोलकर देखें?’ उधर से मोबाइल पर आवाज आयी- ‘नहीं-नहीं, अभी तुम उसे मत खोलो। आजकल चोरी छुपे काफी विस्फोटक सामग्री देश में आ रही है। हो सकता है तरबूज के अंदर बम हो या बम के ऊपर तरबूज का रंग लगा दिया गया हो। मैं इधर से हवलदार दीनू को भेज रहा हूं। वह पता लगाएगा कि बम है या तरबूज। बाद में मुझे फोन करना।’ मोबाइल टेबल पर रखकर थानेदार अपनी शक की सुई का एंगल घुमाते हुए एक हवलदार से बोला- ‘इसका बयान दर्ज करो तब तक हवलदार दीनू जी आते होंगे वे तरबूज एक्सपर्ट है, जितने भी पुलिस के आला अधिकारी है उनके घर पर तरबूज पहुचाने का काम वर्षों से इनके ही जिम्मे है, सर्विस में आने से पहले ये तरबूज कि खेती करते थे इसलिए पचास फिट दूर से ही ये तरबूज को पहचान लेते है। उनके आने पर ही वे फैसला करेंगे कि दूध का दूध ओर पानी का पानी , यानि बम का बम या तरबूज का तरबूज।’ मैंने थानेदार से कहा साहव .. क्यूं राई का पहाड़ बना रहे हैं आप? इसमें तरबूज ही है।’ मेरे इस पुनः निवेदन पर बयान लिखनेवाले हवलदार ने शक की सुई का चार्ज संभालते हुए कहा- ‘हम राई का पहाड़ बना रहे हैं कि तुम बम का तरबूज बना रहे हो? अगर इसमें तरबूज ही है तो भी क्या फर्क पड़ता है? जहां बम फेंकने से सौ-पचास आदमी मरते हैं। वहीं एक-आध आदमी तो तरबूज फेंकने से भी मर सकता है। इसकी मारक क्षमता भले ही कम हो, पर है तो बम का ही रिश्तेदार।’ यह कह उसने थानेदार की ओर देखा और थानेदार मोबाइल चैट पर विजी होते हुये मोबाइल से ध्यान हटाकर हवलदार कि बात सुन फिर चैट के लिए अपनी उंगलिया मोबाइल स्क्रीन पर घुमाते हुये मन ही मन मुस्कुरा रहे थे मानो कोई प्रेमी को प्रेम का उत्तर मिलने पर खुश होता है। हवलदार मेरे बयान लिखते हुये बोला तुम्हारे कई भाईबंद देश में ही इधर-उधर घूमकर बम छुपाए घूम रहे हैं। अब किसी की शक्ल पर थोड़े ही लिखा होता है कि इसके पास बम है या तरबूज। मेरे बयान दर्ज करने वाला हवलदार मुझे राष्ट्रद्रोही, आतंकवादी ,,ओर न जाने क्या क्या साबित करने सवाल पर सबाल दागते हुये ऐसा लग रहा था मानों वह मुझे फांसी पर टँगवाकर खुद के गले में हवलदार से सबइंस्पेक्टर का तमगा टाँगने की तैयारी में सफल होने वाला है। उसने पूछा – ‘आखिर तुमने तरबूज ही क्यों खरीदा? कुछ और भी तो खरीद सकते थें, जिसकी शक्ल बम से न मिलती हो।’ मैंने कहा एक लेख दो व्यंग्य लिखने के दो हजार मिले थे। सोचा, गाँव में मामा जी से बहुत दिन से नहीं मिले है इसमें मैं कुछ खर्च कर उनके पूरे परिवार के साथ फल खाने की इच्छा पूरी करूंगा। अब पचास रूपये में पूरे परिवार के लिए तरबूज के अलावा और कौन-सा फल आ सकता था? अब कभी तरबूज खरीदना तो दूर, उसको कभी देखूंगा भी नहीं।’ कहते कहते मैं रूंआसे से रोने पर छलांग लगाकर रोने लगा। कुछ मेरे रोने से और कुछ मेरी जेब में दो हजार रूपये होने की बात से थानेदार ने मोबाइल पर चैट करना छोड़ मेरी ओर हमदर्दी से देखते हुए कहा- ‘देखो, रोओ मत तरबूज ही है तो फिर डरते क्यूं हो? अभी हवलदार दीनू आकर पता करता है। हम भी क्या करें? जबसे देश में बम कांड हो रहे हैं, हमें भी अलर्ट रहना पड़ता है। फिर देश में चोरी छुपे बम आने की सूचना भी सी.बी.आई. वालों ने दी है। सब पर कड़ी नजरें रखने का हुक्म है। हमारे पाँच सिपाही तो रोजाना जिला चिकित्सालय सहित सभी निजी नर्सिंग होम्स के प्रसूति-गृह भी जाकर डॉक्टर से कन्फर्म करते हैं कि आनेवाली महिला कहीं कोई बम छुपाकर तो नहीं लाई।’
थाने के प्रांगण में हवलदार दीनू अपनी मोटरसाइकल खड़ी कर थाने मे प्रवेश करते हुये, थानेदार ने अपने कमरे में लगे सीसी केमरे को टीवी स्क्रीन पर देखते ही सबसे चुप रहने का इशारा कियां रामदीन ने थानेदार के इशारे पर तरबूज को उठाकर अपने हाथों से दो बार हलके से उछाला, फिर उसे मेज पर रख, सबको दो-दो हाथ पीछे कर उसका कपड़ा खोला मेज पर एक गोलमटोल तरबूज मुस्कुरा रहा था। रामदीन ने तरबूज पर अपना एक हाथ रख, दूसरे हाथ से उसे यूं बजाया जैसे डॉक्टर मरीज के पेट को थपथपाते हैं। इसके बाद उसने तरबूज को ऊपर नीचे, आगे-पीछे देखकर, तीन बार तरबूज की परिक्रमा की। फिर कुछ सोचने लगा। मैं मन ही मन कह रहा था-‘हे भगवान, पचास फीट दूर से तरबूज को पहचानने वाले दीनू हवलदार को आज क्या हो गया? क्या वह अब तरबूज के भीतर घुसकर बतायेगा? इतने में दीनू हवलदार ने एकदम से उछलकर तरबूज के सीने में अपनी नाक रगड़ते हुए, उसे इतनी जोर से सूंघा कि उसके मुंह में पानी आ गया। फिर मुस्कुराते हुए बोला- ‘हुजूर तरबूज ही है, और वह भी चोखा। मेरी मानों तो लेखक जी को जाने दो और तरबूज को गटक लो।’ दीनू हवलदार को थानेदार ने डांटते हुए कहा – ‘हम पुलिस वालों को सिर्फ खाने-पीने की ही सूझती है। तुम लोगों की ऐसी हरकतो से केस हमारे हाथ से निकल कर सीबीआई के हाथों चला जाता है। प्रमोशन मिले तो कैसे ? अरे, जब चीज थाने में आ ही चुकी है तो जाएगी कहां? जरा धीरज रखो। ऊपर भी तो रिपोर्ट करनी है।’ हवलदार दीनू ने थानेदार से कहा -‘हुजूर, महीने की तनख्वाह हार सकता हूं, सीबीआई के आगे। ये तरबूज ही है और तरबूज के अलावा कुछ भी नहीं है चाहों तो इस तरबूज के भीतर कितने बीज हैं बता सकता हूं।’ नहीं, अभी नहीं। जरा ठहरो, हेडआफिस से पूछता हूं।’ यह कह थानेदार ने मोबाइल सर्च कर एक नंबर लगाया। ‘ हलो साब, मैं बोल रहा हूं। दीनू हवलदार ने गहरी छानबीन के बाद बताया कि वह तरबूज ही है और है भी इतना चोखा कि बड़े साब खुश होकर खायेंगे…….. हां-हां, बयान ले लिया है…… अच्छा……अच्छा…….ऐसा…… ठीक है।’ मोबाइल पर अपनी बात समाप्त करने के बाद थानेदार ने मुझसे कहा – ‘देखो, साहब ने कहा है कि मामला चाहो तो बहुत ही संगीन बन सकता है। थाने के स्टाकरूम में बिना जब्ती का चरस, गाँजा,अफीम सहित कई प्रकार के विस्फोटक इंतजार कर रहे है की उनसे किसकी किस्मत जागे ओर उसी के साथ हम उसे जेल के वासी बनाकर उनके परिवार का सुख चैन ओर इज्जत बगैरह छीन ले, ओर अगर तुम खामोशी से बिना छीने तरबूज ओर जेब का माल हमारे हवाले करते हो तो हम इस केस को ही मय तरबूज के रफा-दफा कर देते हैं। तुम भी भूल जाओं कि कभी तरबूज खरीदा था। थानेदार बोला जब तक अमरीका- इज़राइल ओर इराक की जंग चले तब तक तुम कभी अकेल तरबूज खरीदने नहीं जाना, अगर दीनू हवलदार की निगरानी के बगैर तरबूज खरीदोगे ओर खाने की हिम्मत करोगे तो ध्यान रखना एरिया की पुलिस तुम्हारी निगरानी करेगी। इस बीच अगर मुखबिर की या अन्य स्त्रोत की खबर मिली की तुमने बिना पुलिस की निगरानी के तरबूज खरीदा तो देशद्रोह से लेकर जितनी भी धाराए है तुम पर जड़ दी जाएंगी,हमारे यहा किसी की नहीं चलती है सिवाय गांधी छाप हरे हरे नोटो के लिफाफे से लेकर अटैची ही स्वीकार होती है, तुम्हारी साई डीटैल हमारे पास है। अच्छा होगा यह तरबूज खाने का अब तुम सपने में भी ख्याल मत लाना। ओर ध्यान रहे कभी अकेले तरबूज खाने की सोचना भी मत? जब भी खाना चाहेगे तरबूज पुलिस के अफसरों के घर भेजना होगा, अगर उनकी फिर तरबूज लाने की मांग आए तब समझना अधिकारी भी खुश है ओर फिर तुम्हें दंडित करने की बजह तरबूज सहित थाने में हाजिरी देनी होगी। साथ ही ऑनरेरी मजिस्ट्रेट से लिखवा कर लाना होगा कि तुम एक शरीफ आदमी हो और दुबई से तुम्हारा कोई वास्ता नहीं। तुमने जो कुछ दुबई के बारे में कहा, वह कॉमन सेंस की बात है। अब तुम जा सकते हो।’ अब तक मेरे दिलो-दिमाग में ‘तरबूज खरीदना’ एक मुहावरा बन चुका था। जिसका अर्थ होता है, मति मारी जाना, बुद्धि भ्रष्ट होना, अपनी ऐसी-तैसी करवाना आदि। इस मुहावरे के अर्थ से गुजरता हुआ में जब पुलिस चौकी के बाहर निकला तो मेरी जेब के दो हजार रुपए ओर तरबूज के बोझ से दबे जा रहे हाथ दोनों खाली थे, पुलिस थाने में तरबूज के साथ मेरी इंकवायरी आई मीन जांच को लेकर मेरे साथ किया गया बर्ताव से में अपने आप को भारत में जन्म लेने से कोस रहा था। खुश इसलिए था की थानेदार ने लेखक होने के कारण थर्ड डिग्री प्रयोग नहीं किया वरना थाने के कमरों से पुलिसवालों की भद्दी गालियाँ ओर होजपाइप से पिट रहे निर्दोष लोगों की चीखो में मै लूटे जाने के कारण शामिल होने से बच सका। अपने ही शहर के पुलिस थाने में थानेदार ओर पुलिसवालों द्वारा तरबूज प्रसंग पर अनैतिक रूप से की गई कार्यवाही को नैतिकता का जामा पहनाए जाने के कृत्य ने मुझे अंदर तक झकझोर रखा है, पर क्या कर सकता हूँ नेताओ के इशारों पर नाचती पुलिस को नचाने के लिए मैं किसी नेता के पास भी नहीं जा सकता, क्योकि नेता ओर पुलिस अपने आप में अनैतिकता के स्टाम्भ बन चुके है, इन्हे कानून के दायरे का ख्याल नही रहता ये खुदको कानून से ऊपर समझते है, तभी पुलिस थानों में क्या लेखक , क्या पत्रकार, ऊंट पहाड़ के नीचे आ जाये तो वही सब कुछ होता है, जिसका मैं साक्षी होने से आपबीती लिखने जा रहा हूँ।