स्नेहा सिंह
ईरान और अमेरिका-इजराइल के युद्ध के कारण वैश्विक स्थिति गंभीर हो गई है। दुनियाभर में महंगाई, मुद्रास्फीति और कमी की स्थिति बन गई है। क्रूड और गैस की सप्लाई अब भी बाधित है। कई देशों में पेट्रोल-डीजल राशनिंग पर बेचा जा रहा है, तो कहीं लॉकडाउन जैसी स्थिति लागू की गई है। वर्क फ्रॉम होम अनिवार्य किया गया है।इन सबके बीच भारत में भी स्थिति कभी भी बिगड़ सकती है। हाल ही में एक छोटी सी घटना ने पेट्रोल-डीजल खत्म होने की अफवाह फैला दी और लोग घबराकर दौड़ पड़े। यह स्थिति अभी आई नहीं है, लेकिन आने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता।भारत में कभी भी क्रूड की कमी हो सकती है। इसका मुख्य कारण कमजोर ऊर्जा नीति और दीर्घकालिक योजना का अभाव है। विदेश नीति भी कमजोर है, जो ईरान और खाड़ी देशों पर प्रभाव नहीं डाल पा रही।
दूसरी ओर चीन, जिसकी आलोचना भारतीय नेता करते रहते हैं, उसने अपनी जनता के लिए ठोस व्यवस्था कर रखी है। पिछले 40 दिनों से युद्ध चल रहा है, लेकिन चीन पर कोई असर नहीं पड़ा है। उसके पास इतना बड़ा भंडार है कि वह किसी दबाव में नहीं आता।
यदि यह युद्ध लंबा चला, तो भारत में क्रूड संकट तय है। इससे बचने के लिए सरकार को अपनी ऊर्जा नीति मजबूत करनी होगी।
अमेरिका-ईरान युद्ध से सीख लेकर देश की नीतियों को नया स्वरूप देना आवश्यक है। चीन ने वर्षों पहले जियोपॉलिटिक्स में मजबूत रणनीति बनाकर काम शुरू कर दिया था।भारत जहां घोषणाओं और पोस्टरों में व्यस्त रहा, वहीं चीन ने खाड़ी देशों में निवेश कर मजबूत नींव रखी। चीन और अमेरिका भी अपने-अपने हितों के अनुसार पर्दे के पीछे सहयोग करते हैं।read more:https://khabarentertainment.in/awarded-for-outstanding-contribution-in-the-field-of-women-empowerment/
चीन के निवेश वाले किसी भी प्रोजेक्ट को नुकसान नहीं पहुंचा, जबकि भारत का चाबहार प्रोजेक्ट ठप हो गया। इससे भारत को नुकसान हुआ है, लेकिन जनता को यह असफलता दिखाई नहीं देती।विशेषज्ञों के अनुसार भारत की क्रूड सप्लाई चेन लंबी और जटिल है। तेल के जहाज 27 दिनों में भारत पहुंचते हैं, फिर रिफाइनरी, डिपो और पेट्रोल पंप तक पहुंचने में लगभग एक महीना लगता है। युद्ध की स्थिति में यह चक्र और धीमा हो गया है।गैस की स्थिति और भी खराब है। गैस की कमी के कारण कई छोटे व्यवसाय बंद हो गए हैं और मजदूर अपने गांव लौट रहे हैं।भारत में केवल 40 प्रतिशत गैस का घरेलू उत्पादन होता है, बाकी 60 प्रतिशत आयात करना पड़ता है। लगभग 33 करोड़ लोग एलएनजी का उपयोग करते हैं।भारत में रोजाना 57 लाख बैरल क्रूड की खपत होती है, जबकि 52 लाख बैरल उपलब्ध होते हैं। इसमें से 93 प्रतिशत आयात विदेशी जहाजों से होता है, जिससे परिवहन खर्च भी बढ़ता है।भारत को अपने तेल परिवहन बेड़े को मजबूत करना होगा। वर्तमान में भारत के पास केवल 25 दिनों का प्रोसेसिंग स्टॉक है, जिससे सप्लाई चेन कमजोर हो रही है।चीन के पास 1.3 अरब बैरल का रणनीतिक और वाणिज्यिक भंडार है। पिछले पांच वर्षों में उसने ऊर्जा नीति में बड़े बदलाव किए हैं और खाड़ी देशों में भारी निवेश किया है।उसकी दैनिक आयात क्षमता 11.6 मिलियन बैरल तक पहुंच गई है। 2026 तक उसकी स्टोरेज क्षमता 1.3 अरब बैरल से अधिक हो गई है, जिसमें 900 मिलियन बैरल सरकारी और 400 मिलियन बैरल निजी कंपनियों के पास है। यह भंडार लगभग 4 महीने तक चल सकता है।दूसरी ओर भारत के पास केवल 40 दिनों का स्टॉक है और उसे 41 देशों से क्रूड खरीदना पड़ रहा है। कमजोर ऊर्जा और विदेश नीति को मजबूती बताकर जनता को भ्रमित किया जा रहा है।read more:https://khabarentertainment.in/three-blood-donors-donated-blood-on-behalf-of-jai-ambe-blood-donation-committee-