मुझे थोड़ी सी सांसे दे दो मां,
मा,
तुम्हारे अंतर मन की
एक बहुत छोटी सी धड़कन
इतनी छोटी कि
अभी शब्द भी नहीं बन पाई ,
बस
धीरे-धीरे शरीर मे
तुम्हारी सांसों के साथ
घुलना,मिलना सीख रही ।
मां,
तुमने ही कहा
ईश्वर दिखाई नही देते
उन्होंने मां बनाई।
क्या मैं
उसी दयालु ईश्वर की भूल
या तुम्हारी अधूरी
आकांक्षा की प्रार्थना?
मैंने अभी
चक्षु भी नहीं खोले,
पर महसूसा
तुम्हारे मन का भय,
घर के कोनों में
हृदय भेदी कानाफूसी,
उन शब्दों की खून
जमा देने वाली ठंडक
जो कहते
“बेटी नहीं बेटा चाहिए,
मां,
मैं तेरी अजन्मी प्रतिछाया
जिसका न रूप, ना अस्तित्व,
मैं बस
तेरी हथेली की
महीन रेखा बनना चाहती
तुम्हारी हंसी में
एक हल्की सी गूंज,
तुम्हारी थकान में
एक कोमल सा अहसास।
मुझे भी
गुड़िया से खेलना
पल्लू पकड़कर
चलना ,
रसोई की खुशबू में
तुम्हारा हाथ बटाना था।
मां,
तुम भी तो
किसी माँ की सांसे रही
विस्मृत कैसे कर गईं,
बेटियां
घर नहीं छोड़तीं,
वे तो घर को
अपने भीतर समा लेती हैं।
कोई बोझ नहीं हूँ मां,
मैं
तुम्हारे ही अंश की
एक नाजुक,
कोमल परछाई
जिसे
बस थोड़ी सी
गुनगुनी धूप चाहिए,
थोड़ी सी सांस,
और
जीने का एक
छोटा सा अवलंब।
मां,
मत धकेलो मुझे
उस अंधकार में
जहां उजाले
की कोई आस नहीं ,
जहां आशाएं
जन्म लेने से पहले ही
विलुप्त हो जातीं ।
मुझे भी
सृष्टि की सोंधी मिट्टी पर
पैर रखने दो,
मैं भी
तुम्हारी तरह
एक दिन
किसी घर का आकाश
बनना चाहती बस,
इतनी सी विनती
मुझे भी
थोड़ी सी सुबह का
उजाला दे दो
मैं
तुम्हारे ही दीपक की
महीन बाती हूँ।