मालवीय जी के सामाजिक दर्शन

मालवीय जी के सामाजिक दर्शन

मालवीय जी के सामाजिक दर्शन
राजेश मिश्र
राजेश मिश्र,  हिन्दू श्रमिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।
मालवीय जी के धार्मिक विचारों और धार्मिक कार्यों में भी समाज का हितचिंतन निहित था। 
-    ह्लगौरक्षा संघह्व की स्थापना भी की थी।
-     वे सनातन धर्म सभा, हिन्दु महासभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन इत्यादि अनेक संस्थाओं के बहुमुखी नेता, संचालक और प्राण थे। 
-    सन् 1932 में जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेमजे मैकडानल्ड ने साम्प्रदायिक निर्णय दिया, तब मालवीय जी ने इसका मुखर विरोध किया। 
-    कई बार उनके धार्मिक विचारों को साम्प्रदायिकता से ग्रस्त दृष्टिकोण से देखा गया। लेकिन वास्तव में वे एक राष्ट्रवादी और सच्चे देशभक्त थे। 
-    लाहौर में 28 जून 1933 को दिए उनके एक भाषण में उन्होंने स्वयं कहा था कि ह्लस्वतंत्रता प्राप्ति के लिए प्रथम कदम हिन्दु तथा मुसलमानों की एकता का होना है। मैं धर्म में विश्वास रखता हूं।श्
पंडित मदनमोहन मालवीय जी महाराज की उम्रभर की राष्ट्रीय और सामाजिक सेवाओं का चिरस्थायी स्मारक बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय है। प्रारम्भ से ही उनका स्वप्न था कि एक ऐसा शुभ दिन आए जब भारतीय युवावर्ग को उच्चशिक्षा के लिए विदेश न जाना पड़े। वे यह देखकर भी द्रवित होते थे कि अन्य धर्माबलम्बी अपने धर्म के विषय में जो ज्ञान रखते हैं, हिन्दु विद्यार्थी अपनी समृद्ध संस्कृति के विषय में उतना ज्ञान नहीं रखते। ऐसे महान उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कि भारतीय भी अपनी समृद्धशाली संस्कृति की अस्मिता से परिचत हों, मालवीय जी ने अथक श्रम किया। देश के कोने कोने से सहायता और धनराशि जोड़ने के लिए इस महापुरुष ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया। यह थी उनकी समाज सेवा और ऐसा था मालवीय जी का सामाजिक चिंतन।
मालवीय जी के सामाजिक दर्शन में एक देश की आत्मनिर्भरता का महत्वपूर्ण स्थान था। वे तत्कालीन भारतीय समाज की उस दशा से दुखी थे कि एक समय का भारत जैसा समृद्ध देश चाकू, कपड़े, बटन और साबुन जैसी दैनिक उपयोगी वस्तुओं के लिए इंग्लेण्ड पर आश्रित था। सन् 1881 में प्रयाग में मालवीय जी ने एक देशी ह्लतिजारत कम्पनीह्व की स्थापना की, जो दैनिक उपयोग की वस्तुओं का निर्माण करती थी। हांलाकि यह मात्र छ: माह की अवधि तक ही चल सकी थी।