indira gandhi: प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी की कार्यशैली आज भी प्रासंगिक हैl

indira gandhi: प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी की कार्यशैली आज भी प्रासंगिक हैl

(31 अक्टूबर इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि)
प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी की कार्यशैली आज भी प्रासंगिक हैl


अपनी मृत्यु के कुछ दिन पूर्व उड़ीसा की एक सभा में उन्होंने कहा था" अगर मैं देश के लिए मर भी गई, तो मेरे खून का एक एक कतरा देश को मजबूती प्रदान करेगाl इंदिरा जी के बलिदान से उनकी यह बात बिल्कुल सच साबित हुई आज वह हमारे बीच भले ही ना हो, किंतु उनका कृतित्व अभी देश का मार्गदर्शन कर रहा है, तभी तो उनकी याद में लोग आते हैं जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगाl
इंदिरा गांधी यूं ही लौह महिला नहीं कहलाती थी, उनके द्वारा किए गए कार्य आज भी अत्यंत समीचीन तथा प्रासंगिक है। प्रधानमंत्री बनने के साथ ही उन्होंने गरीबी उन्मूलन का जोर शोर से एवं पूरी ताकत के साथ अभियान शुरू किया जो आज भी जारी हैl सही तौर पर देखा जाए तो इंदिरा जी का सक्रिय राजनीतिक जीवन उनके बचपन से ही शुरू हो गया था, उनके पिता जवाहरलाल नेहरू उन दिनों भारत के स्वतंत्रता संग्राम में सच्चे सिपाही के रूप में संघर्षरत थे इसलिए उनके घर पर महात्मा गांधी, सरदार वल्लभ भाई पटेल, लाल बहादुर शास्त्री, राजगोपालाचारी, सरोजनी नायडू, जैसे अनेक महान संत संग्राम सेनानियों का आना जाना लगा रहता थाl उनके घर का राजनैतिक माहौल का उन पर अनुकूल प्रभाव पड़ा एवं तत्कालीन महान नेताओं के सानिध्य के प्रतिरूप इंदिरा जी भी प्रखर राजनीति की तरफ उन्मुख होने लगीl

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1929 और 30 में जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का बिगुल फूंका तब इंदिरा जी मात्र 12 वर्ष की आयु में वानर सेना के नाम से अपने हम उम्र बच्चों का एक दल बनाया था और यही वानर सेना राजनैतिक कार्यकर्ताओं के संदेश को एक दूसरे के पास पहुंचाते थेl 1938 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य बनी, तब उनकी आयु मात्र 22 वर्ष की थीl 1939 में उन्हें 13 महीने के लिए जेल जाना पड़ाl उसके बाद भारत छोड़ो छोड़ो आंदोलन के दौरान अपने विवाह की कुछ माह बाद ही उन्हें फिर जेल की सजा भुगतनी पड़ीl इंदिरा जी ने 1931 से लेकर वर्ष 1933 तक पूना में रहकर अपनी हाई स्कूल की पढ़ाई पूरी की, इसके बाद रविंद्र नाथ ठाकुर जी के सानिध्य में रहकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए उन्हें शांति निकेतन भेज दिया गया था जहां वे 1934 से लेकर 1935 तक रही। किंतु उसके पश्चात मां की बीमारी के कारण पढ़ाई अधूरी छोड़कर उन्हें 1935 से 36 तक उनकी सेवा करने के लिए उनका ख्याल रखने के लिए स्विजरलैंड जाना पड़ा। इसके पश्चात कुछ समय तक इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में इतिहास का अध्ययन भी किया।

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स्वदेश लौटने के बाद इंदिरा जी का विवाह 26 मार्च 1942 में फिरोज गांधी के साथ हुआ। विवाह के पश्चात इंदिरा जी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपने पिता एवं पति का खुलकर साथ देने लगीं। बचपन से राजनीति में सक्रिय रहने का उन्हें पूरा लाभ मिला और वह देश की एक प्रखर नेता बनकर उभरीं। 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी के बाद उनके पिता जवाहरलाल नेहरू देश के प्रथम प्रधानमंत्री बनाए गए ।इस दौरान इंदिरा गांधी कांग्रेस में सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में अपने पिता का साथ देती रही। 1959 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। वर्ष 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के पश्चात जब लाल बहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमंत्री बने तो उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया और 11 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री जी के निधन के बाद उन्हें सर्वसम्मति से देश का पहला महिला प्रधानमंत्री चुना गया। अपने प्रधानमंत्री तो काल में उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा किंतु अपने पक्के इरादे साहस धैर्य एवं ऊर्जा के साथ उन्होंने हर समस्या का डटकर मुकाबला किया। फिर चाहे वह 1966 की अकाल समस्या हो 1966 का राष्ट्रपति चुनाव हो या 1971 का आम चुनाव इंदिरा गांधी जी ने सभी संकटों का सामना डटकर किया एवं उस पर सफलता पाई।

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1971 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया तो इंदिरा जी ने देश के सिपाहियों के साथ ललकार कर उसे बहुत बड़ी शिकस्त दी और बांग्लादेश नामक नए राष्ट्र का उदय करवाया। यह एक ऐतिहासिक घटना इंदिरा जी के साहस की इतिहास में लिखी गई है। उन्होंने सूचना क्रांति की आवश्यकता को देखते हुए 1975 में देश का प्रथम उपग्रह आर्यभट्ट का प्रक्षेपण करवाया। गरीबी दूर करने के लिए गरीबी उन्मूलन आंदोलन भी छेड़ा और ऐसे उद्योगों को रेखांकित किया जिनका कुशलता पूर्वक उपयोग नहीं किया जा रहा था जिसमें एक बीमा उद्योग का दूसरा कोयला उद्योग उन्होंने 1972 में बीमा कारोबार का राष्ट्रीयकरण किया कोयला उद्योगों में श्रमिकों के शोषण को रोका और 1972 में ही कोयला उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया ।

उन्होंने देश में हदबंदी कानून भी लागू किया एवं ग्रामीण बैंकों की स्थापना अनिवार्य कर दी गई। इससे ग्रामीणों को तथा कृषकों को तत्काल एवं सुलभ ऋण सुविधा उपलब्ध हो पाई। उन्हें उनकी महत्वपूर्ण उपलब्धियों के लिए 1972 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया। 23 जून 1980 की सुबह इंदिरा जी को एक ह्रदय विदारक घटना का सामना करना पड़ा, उनके छोटे पुत्र संजय गांधी जी का विमान दुर्घटना में मृत्यु हो जाना एक दुखद घटना थी। इस घटना ने उनके मातृ हृदय को हिला कर रख दिया था। अपने छोटे पुत्र संजय गांधी की मृत्यु के पश्चात इंदिरा जी ने अपने बड़े पुत्र राजीव गांधी को देश सेवा में लगा दिया था। देश सेवा के लिए अपने सुखों का त्याग करने वाली इस वीरांगना को एक बार फिर मानवीय क्रूरता का सामना करना पड़ा, 21 अक्टूबर 1984 को उनके ही दो अंगरक्षको ने उन्हें आवास पर ही गोलियों से छलनी कर दिया था। इस हृदय विदारक घटना से पूरा देश स्तब्ध रह गया। यह देश के लिए अपूरणीय क्षति थी। इंदिरा जी आज हमारे बीच नहीं है लेकिन उनके द्वारा किए गए महान कार्यों को हम याद करके उन्हें नमन करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
संजीव ठाकुर,चिंतक, लेखक, रायपुर छत्तीसगढ़