entertainment khabar: बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड का बोलबाला

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रवींद्र दुबे

इन दिनों बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड का बोलबाला है. पटकथा लेखक सलीम जावेद की जोड़ी ने ‘दीवार’ जैसी फिल्मों के जरिये  हिन्दीफिल्मों में डॉन या गिरोह के सरगना के जीवन को जिस तरह महिमा मंडित किया है उससेफ़िल्मनिर्माताबॉक्स ऑफिस पर  इस थीम के सफल होने  के प्रति आश्वस्त हो गए और ऐसी फिल्में बहुतायत से बननेलगीं. या यूं भी कहा जा सकता है कि एक तरह से  गैंगस्टर फिल्में  बॉक्स ऑफिस पर सफलता की गारंटी हो गईं.

          लेकिन कला तो कला है. वह हमेशा जिन्दगी की नक़ल करती है. अंडरवर्ल्ड जब समाज का एक अभिन्न अंग हो गया तो उसका प्रतिबिम्ब फिल्मों में भी झलकने लगा. जिस फ़िल्म ने अमिताभ बच्चन को महानायक बनाया, उसी का उदाहरण लें. ‘दीवार’ फ़िल्म में अमिताभ बच्चन का किरदार सत्तर के दशक में पनपे  माफिया डॉन हाजी मिर्जा मस्तान से प्रेरित है. वह शुरू में मुम्बई की गोदी पर कुली का काम करता था और वहां से उठ कर सोने चांदी की तस्करी करने लगा. ये और बात है कि मस्तान का अंत फ़िल्म के नायक जैसा नहीं हुआ. फिल्मी पंडितों का कहना है कि फिल्मों में अंडरवर्ल्ड के चरित्रों का प्रवेश इसी फ़िल्म से हुआ. इसके बाद तो ये सिलसिला चल निकला.

          ‘डैडी’ और‘हसीनापारकर’ इस श्रंखला की बादकी फिल्में है. दोनों2017 में रिलीज हुई हैं. ‘डैडी’ मुम्बई के डॉन और दगडी चाल के बादशाह अरुण गवली पर बनी है. एक बार फिर दर्शकों ने एक ‘गैंगस्टर’ को देखा जो बाद में राजनीति में आया और मुम्बई के चिंचपोकली इलाके से विधायक भी चुना गया. हालांकि यह एक अलग मुद्दा है वास्तविक जीवन में अरुण गवली कहीं से कहीं तक भी गैंगस्टर नहीं लगता. अर्जुन रामपाल ने उसका किरदार बखूबी निभाया है. केन्द्रीय मुम्बई के ऊबड़ खाबड़ रास्तों और छोटी छोटी गलियों से शुरू होती है अरूण गवली की दास्तान जो अपनी तकदीर खुद लिखता हुआ भारत का सर्वाधिक खतरनाक गैंगस्टर बन जाता है. कामगार वर्ग के अपने अडौस पड़ौस के लिए वहएक आधुनिक रॉबिन हुड है. उसका और एक पुलिस इंस्पेक्टर का संघर्ष उसे चार दशकों में कहाँ से कहाँ ले जाता है, यह इस फ़िल्म में बखूबी दर्शाया गया है.

वहीं दूसरी और ‘हसीना पारकर’ दाऊद इब्राहीम की बड़ी बहन हसीना पारकर के जीवन पर आधारित है जोदाऊद की गैर मौजूदगी में लोगों के संपत्ति से सम्बन्धित झगड़े निपटाया करती है.. 2007 में हसीना पारकर के खिलाफ एक गिरफ्तारी वारंट जारी होता है  जिसके बाद वह गायब हो जाती है.. सुनवाई के दिन वह  कोर्ट में आत्मसमर्पण करदेती है.. हसीना पर एक बिल्डर से पैसा ऐंठने और दुबई में जा बसे अपने भाई के अवैध व्यापार की देखभाल करने का आरोप हैजिससे उसे इनकार है. चूंकिकोई गवाह सामने नहीं आता इसलिए जज उसे जमानत दे देता  है.

श्रद्दाकपूर ने हसीना के चरित्र को परदे पर जिया और काफी हद तक अपनी भूमिका के साथ न्याय करने में सफल रही. मजेदारबाततो यह है कि हसीना के पति इब्राहीम पारकर की हत्या अरुण गवली गैंग के लोगों ने की थी. उन्होंने अरुण गवली के बड़े भाई पापा गवली की हत्या का बदला लिया था. यह भी एक संयोग ही है किये दोनों फिल्में एक ही साल कुछ समयांतर से रिलीज हुईं.

          अगर हाजी मस्तान किसी चरित्र की प्रेरणा हो सकता था, तो मुम्बई पर दो दशक यानी1960 से 1980 तक राज करने वाला वरदराजन मुदलियार क्यों नहीं होता. फीरोज खान की ‘दयावान’ के नायक का चरित्र पूरी तरह वरदराजन मुदलियार के चरित्र पर आधारित था. मुदलियार का मुख्या धंधा अवैध शराब का था जिसकी कई भट्टियां उन दिनों मुंबई के उपनगरों में हुआ करती थीं. लेकिनइसफ़िल्म में उसे तस्करी करते दिखाया गया है.इस फ़िल्म में गॉडफादर का भी पुट है. लोग अपने अपने मसले और समस्याएं लेकर नायक के पास आते हैं, जिनका वह फैसला करता है. वह गरीब लोगों का मस्रीहा भी है जो हर तरह से उनकी मदद करता है. बाद में 1983 में बनी अर्ध सत्य के खलनायक रामा शेट्टी के चरित्र में भी वरदराजन मुदलियार का समावेश किया गया था. बाद में विधुविनोद चोपड़ा की ‘परिंदा’ में नाना पाटेकर द्वारा अभिनीत अन्ना का किरदार भी मुदलियार से ही प्रेरित बताया जाता है.

          जब यह स्पष्ट हो गया कि अंडरवर्ल्ड के चरित्रों पर बनी फ़िल्में बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट होती हैं, तो फिर ऐसी अनेकों फिल्में बनीं. और मांजरेकर की ‘वास्तव’के नायक रघु पर भी छोटा राजन का असर देखा जा सकता है.

दरअसलगिरोहबाजी की फिल्मों का सही मतलब समझाया में रामगोपाल वर्मा ने. उन्होंने अंडरवर्ल्ड या गैंगस्टर फ़िल्म को  बॉलीवुड में पूरी तरह स्थापित कर दिया. सत्या(1999) औरकम्पनी(2002) नेसारे आदर्श नियमों और एंटी हीरो या विलेन के आस पास के सिध्दांतों को ताक पर रख दिया. इनफिल्मों में कैमरा अंधेरी गलियों में ही नहीं, बल्कि अँधेरे चरित्रों पर भी घूमता है.‘सत्या’ में भीखू म्हात्रे का किरदार भी अरुण गवली पर ही आधारित बताया जाता है.

2002 में आई ‘कंपनी’ मेंमलिक (अजय देवगन) माफिया डॉन असलम भाई  का आदमी है जो एक सरफिरे चंद्रकांत (विवेक ओबेरॉय) को अपने गिरोह में भर्ती कर लेता है. दोनों मिलकर काफी कहर बरपा करते हैं और अपने सब दुश्मनों को मौत के घाट उतार देते हैं. मुम्बई में उनका आतंक छा जाता है. जैसे जैसे उनके साम्राज्य का विस्तार होता है, दोनों एक दूसरे से अलग होते चले जाते हैं. दरअसल यह फ़िल्म माफिया सरगना दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन की दुश्मनी पर आधारित है. इसफ़िल्म में मलिक(अजय देवगन) का चरित्र दाऊद इब्राहीम पर और चंद्रकांत(विवेक ओबेरॉय) का किरदार छोटा राजन पर आधारित है.

          ‘शूटआउटएट लोखंडवाला’ में तो दाऊद इब्राहीम के लिए काम कर रहे एक मामूली से प्यादे माया डोलस को लाखों में खेलते दिखाया गया है. माया का किरदार विवेक ओबेरॉय ने बखूबी निभाया है.1991 में गर्मी के एक दिन मुम्बई स्थित लोखंडवाला काम्प्लेक्स की स्वाती बिल्डिंग के फ्लैट 32 बी में पांच अपराधी70 लाख रुपया गिन रहे थे तब ए.सी.पी. खान के नेतृत्व में 286 पुलिसकर्मियों ने बिल्डिंग के बाहर अपनी पोजीशनें ले लीं. गोलीबारी हुई और पूरे देश ने छः घंटों तक दिनदहाड़े चलने वाला बहुचर्चित  एनकाउंटर देखा जिसने उपनगरीय मुम्बई को एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील कर दिया. बाद में खान के खिलाफमानवाधिकारों के उल्लंघन के सिलसिले में  एक विभागीय जांच हुई. महेंद्र उर्फ माया डोलस और उसके निशानेबाज साथी दिलीप  बुवा ने 90 के दशक की शुरूआत में जबरिया वसूली को आम बात बना दिया था.

          ‘शूटआउटएट लोखंडवाला’ की सफलता ‘शूटआउटएट वडाला’ (2013) कीप्रेरणासाबित हुई.दरअसल‘शूटआउट एट वडाला’ मुम्बई पुलिस द्वारा अंडरवर्ल्ड के खिलाफ पहले पुलिस एनकाउंटर की कहानी है. ये दोनों फिल्में सीरियल क्वीन एकता कपूर ने बनाई हैं. मनोहर अर्जुन सुर्वे उर्फ मन्या सुर्वे कॉलेजका एक छात्र है जो विद्या से प्रेम करता है. वह अपने सौतेले भाई भार्गव और अपनी माँ के साथ रहता है. भार्गव एक स्थानीय गुंडा है. एकदिन उसका किसी दूसरे गुंडे से झगड़ा होता है जो उसके हाथों मारा जाता है. पुलिसइंस्पेक्टर अम्बोलकर मन्या को घटनास्थल पर मौजूद होने के कारण कॉलेज से गिरफ्तार कर जेल में डाल देता है जहाँ भार्गव को एक गुंडा मार देता है और शेख मुनीर( तुषार कपूर) मन्या को बचा लेता है. वे दोनों जेल से भागकर मुम्बई वापिस आ जाते हैं और जुबेर (मनोज वाजपेयी) के गिरोह में शामिल होने के कोशिश करते हैं. जुबेर का भाई दिलावर (सोनू सूद) उनके खिलाफत करता है. तबमन्या शेख मुनीर और तीन अन्य के साथ अपना गिरोह बनाता है और मुम्बई में इतना कहर बरपा कर देता है कि पुलिस को उसे रोकने के लिए रास्ता निकालना पड़ता है.

          ऐसा नहीं है कि हाजी मिर्जा मस्तान का चरित्र सिर्फ‘दीवार’ में ही इस्तेमाल हुआ है. एकता कपूर सारा ही निर्मित ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुम्बई’ में सुलतान मिर्जा( हाजी मस्तान) का किरदान अजय देवगन ने निभाया है और इमरान हाशमी ने शोएब खान (दाऊद इब्राहीम) का. यह फ़िल्म भी बॉक्स ऑफिस पर सफल रही और इसी से प्रेरित हो कर एकता कपूर ने ‘वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई दोबारा’ भी बनाई. दोनों ही फिल्में सफल रहीं.

          अभी तक की सारी गैंग्स्टर फिल्मे मुम्बई माफिया पर आधारित थीं. 2017 में ही एक फ़िल्म आई जो गुजरात के शराब माफिया डॉन अब्दुल लतीफ के जीवन से प्रेरित थी . ‘रईस’ नामकइस  फ़िल्म में  जाने माने अभिनेता शाहरूख खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी.अस्सी और नब्बे के दशक के कालखंड पर बनी यह फिल्म एक ऐसे शख्स की कहानी है जो शराब का साम्राज्य गुजरात जैसे एकमात्र राज्य में खड़ा करता है जहां शराबबंदी है. यह उसके उत्थान और उनसंबंधों की कहानी है जो उसे राज्य में एकमात्र सर्वाधिक शक्तिशाली व्यक्ति बनने में मदद करते हैं.

सवाल ये है कि अपराधियों पर बनी फिल्में क्यों हिट होती हैं ? ये फिल्में समाज को क्या संदेश देती हैं? इसका जवाब शाहरूख खान ने दिया है. उन्होंनेकहा है कि सभीफिल्मों का समाज को संदेश देना जरूरी नहीं है. वे महज मनोरंजन का औजार भी हो सकती हैं. अफसोसनाक बात तो यह है की हर कोई ऐसा नहीं सोचता.एंटी हीरो फिल्मों में नायक अक्सर आर्थिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से आता है. अपने परिवार के भरण पोषण के लिए अपराध में लिप्त होना उसके लिए जायज हो जाता है. छोटी मोटी चोरी से लेकर नशीली दवाइयों की तस्करी और बम विस्फोट करने तक अपराध की दर और किरदार की खूंरेजी बढ़ती चली जाती है.

          दुर्भाग्य से इनमें से अधिकतर फिल्मों में अपराधी की छवि लार्जर-देन- लाइफ होती चली जाती है. उसके  जीवन का असलियत से कहीं ज्यादा  काफी महिमामंडन होता है.ये फिल्मे गैंगस्टरों को रहस्यमय और ताकतवर लोगों के रूप में स्थापित करती हैं. ये वे लोग हैं जो कहीं नहीं झुकते और क़ानून तोड़ते हैं. वे अपने क़ानून से चलते हैं जिसेकोई और नहीं तोड़ सकता. इस सब के बावजूद वे पारिवारिक लोग है. ‘सत्या’ काभीखू म्हात्रे परिवार के साथ होटल में खाना खाने जाता है और दोस्त की होने वाली पत्नी को ज्वेलर के यहाँ से महँगा तोहफा खरीद कर देता है.पहले तो दर्शक उसके बड़ा आदमी बनने के संघर्ष में शामिल होता है और बाद में उसके उन उसूलो का शिकार बनता है जिससे वह अपराधी जीवन बिताता है.

          काल्पनिक रचनाओं में यथार्थ का चित्रण एक बात है और जिसे महिमा मंडित नहींकिया जाना चाहिये उसे आसमान पर चढादेना या किसी अपराधी को हीरो बना देना  दूसरी बात. इसी तरह एक अपराधी की कहानी दिखाने कीकोशिश एक बात है और उसे और उसकी गतिविधियों को सही ठहराना दूसरी बात. फिलहाल बॉलीवुड वही कर रहा है.

और फिर जब ऐसे अनेकों प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं जिनके जीवन पर बायोपिक बनाए जा सकते हैं तो फिर अपराधियों या गैंगस्टरों पर फ़िल्म बनाने का मतलब क्या है? जोअभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चिल्लाते हैं, उन्हें ध्यान रखना चाहिए की ये फिल्में जनता – खासकर नई पीढी को प्रभावित करती हैं, लिहाजाइन दिनों ऐसी फिल्मों के जरूरत है जो नैतिक मूल्यों की कसौटी पर खरी उतरें. इति