बापू, मालवीय जी को बड़ा भाई मानते थे- राजेश मिश्र

बापू, मालवीय जी को बड़ा भाई मानते थे- राजेश मिश्र

(राजेश मिश्र,  हिन्दू श्रमिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

  • मालवीयजी ने सम्पादक बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर ‘हिन्दोस्तान’ को लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाया ।
  • महामना मालवीयजी का योगदान केवल अध्यापन और राजनीति तक ही सीमित नहीं है
  • वह राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहते थे और इसकी शुरूआत हुई 1888 ई में, जब उन्हें अपने गुरु आदित्यराम भट्टाचार्य के साथ काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लेने का मौका मिला

एक धार्मिक परिवार में पले-बढ़े मदन मोहन मालवीय को धार्मिक संस्कार विरासत में मिले थे ।  अपने पिता और दादा की तरह मालवीयजी भी धार्मिक प्रचार करने के इच्छुक थे, परन्तु परिस्थितियों के दबाव के चलते उन्हें अध्यापन में आना पड़ा । परन्तु धार्मिक संस्कारों ने इनके भावी व्यक्तित्व को प्रभावित अवश्य किया ।

मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद इन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त की और इसके बाद इलाहाबाद में आकर विद्यालय में अध्यापन करना प्रारम्भ कर दिया ।  अपने व्यवहार और पढ़ाने की विशेष शैली के कारण मालबीयजी अपने विद्यार्थियों के बीच काफी लोकप्रिय थे ।

लेकिन असाधारण प्रतिभा के धनी पण्डित मदन मोहन मालवीयजी का कार्यक्षेत्र केवल अध्ययन-अध्यापन तक सीमित नहीं था । वह राजनीति में भी सक्रिय भूमिका निभाना चाहते थे और इसकी शुरूआत हुई 1888 ई में, जब उन्हें अपने गुरु आदित्यराम भट्टाचार्य के साथ काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में भाग लेने का मौका मिला ।

बाद में, उन्होंने काँग्रेस में अपनी एक खास जगह बना ली और स्वतन्त्रता-संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई । महामना चार बार काँग्रेस के अध्यक्ष क्रमशः वर्ष 1909, 1918, 1932 तथा 1933 में रहे ।  मालवीयजी ने काँग्रेस के ‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ के बीच एक जोड़ने वाली कड़ी के रूप में कार्य करते हुए राजनीतिक स्तर पर अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अदा की और स्वतन्त्रता-संग्राम के पथ-प्रदर्शक बने ।

महामना मालवीयजी का योगदान केवल अध्यापन और राजनीति तक ही सीमित नहीं है । स्वभाव से शालीन, विनम्र, उदारचित्त और सादा जीवन व्यतीत करने वाले मालवीयजी की पहचान एक सफल शिक्षाविद, पत्रकार, सम्पादक, समाज-सुधारक, वकील और एक कुशल वक्ता की भी है ।

1886 ई. में जब उन्होंने काँग्रेस अधिवेशन में भाषण दिया तो कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह उनसे बहुत प्रभावित हुए और उनसे ‘हिन्दोस्तान’ नामक साप्ताहिक समाचार-पत्र का सम्पादक बनने का अनुरोध किया । मालवीयजी ने सम्पादक बनने का प्रस्ताव स्वीकार कर ‘हिन्दोस्तान’ को लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचाया ।

तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं पर उनके द्वारा लिखे गए निर्भीक लेखों और टिप्पणियों को बहुत सराहा जाता था ।  मालवीयजी ने बाद में ‘इण्डियन ओपिनियन, ‘लीडर’, ‘मर्यादा’, ‘सनातन धर्म’, ‘हिन्दुस्तान टाइम्स’ तथा ‘अभ्युदय’ का सम्पादन भी किया । इस प्रकार, उन्होंने भारतीय पत्रकारिता को नया आयाम प्रदान करते हुए अपना अविस्मरणीय योगदान दिया ।

महान स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, वकील और समाज सुधारक मदन मोहन मालवीय की आज जयंती है. 25 दिसंबर, 1861 को एक संस्कृत ज्ञाता के घर में जन्मे महामना ने 5 की उम्र से ही संस्कृत की पढ़ाई शुरू कर दी थी. उनके पूर्वज मध्यप्रदेश के मालवा से थे. इसलिए उन्हें 'मालवीय' कहा जाता है. उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. पहले उन्होंने शिक्षक की नौकरी की. इसके बाद वकालत की. वो एक न्यूज पेपर के एडिटर भी रहे. 1915 में उन्होंने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना की. वो हिंदू महासभा के संस्थापक रहे.


महात्मा गांधी ने मदन मोहन मालवीय को महामना की उपाधि दी थी. बापू उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे. मदन मोहन मोहन मालवीय ने ही सत्यमेव जयते को लोकप्रिय बनाया. जो बाद में चलकर राष्ट्रीय आदर्श वाक्य बना और इसे राष्ट्रीय प्रतीक के नीच अंकित किया गया. हालांकि इस वाक्य को हजारों साल पहले उपनिषद में लिखा गया था. लेकिन इसे लोकप्रिय बनाने के पीछे मदन मोहन मालवीय का हाथ है.