समाज के प्रति समर्पण की भावना- राजेश मिश्र

समाज के प्रति समर्पण की भावना- राजेश मिश्र

(राजेश मिश्र,  हिन्दू श्रमिक सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )

लखनऊ : देश की प्रगति एंव उत्थान के लिए सर्वस्व त्याग और समर्पण की भावना के पोषक मालवीय जी ने सन् 1931 ई. में लंदन में आयोजित दिवतीय गोलमेज सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया और सांप्रदायिकता तथा सामाजिक सद्भाव एंव समरसता पर जोर दिया। हालांकि 1891 में मालवीय जी ने वकालत की परीक्षा पास की लेकिन देश सेवा में अनुरक्त यह युवक उच्च न्यायालय की सीमा में न रह सका।

महापुरुष सांसरिक प्रलोभनों में फंसकर अपने निश्चित लक्ष्य से कभी भी दूर नहीं होते।

ऐसी विचारधारा के घोतक मालवीय जी ने देश की प्रगति के लिए अपना सर्वस्व त्याग कर दिया।

शिक्षा के क्षेत्र में मालवीय जी का योगदान

ऐसे विचारों से ओत प्रोत मालवीय जी ने शिक्षा पर विशेष बल दिया। साथ ही वह स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। शिक्षा संबंधी अपनी धारणा को साकार करने के लिए उन्होंने 1918 में बनारस में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की। जोकि भारत के प्रमुख विश्वविद्यालयों में विद्यमान है।

साथ ही यह हिंदी, हिंदु और हिंदुस्तान के कट्टर समर्थक थे। ऐसे में इनका मानना था कि बिना हिंदी ज्ञान के देश की उन्नति संभव नहीं है। साथ ही इन्होंने प्रयाग में हिंदी साहित्य सम्मेलन की भी स्थापना की थी। इतना ही नहीं मालवीय जी की अपने देश और स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल में भी गहरी आस्था थी। और यह लोगों को भी स्वदेशी के इस्तेमाल के बारे में जानकारी दिया करते थे।

मदन मोहन मालवीय का राजनीतिक सफर

मालवीय जी ने कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अपने भाषण से सबको चकित कर दिया था। जिसके चलते साल 1909 में लाहौर के अधिवेशन में राष्ट्रीय महासभा कांग्रेस के सभापति चुने गए। तो वहीं मालवीय जी 1910 से 1920 तक उत्तर प्रदेश की केंद्रीय असेम्बली के सदस्य रहे। रौलट एक्ट के विरोध में उनके ओजस्वी भाषण को सुनकर अंग्रेज भी भयभीत हो गए थे। साथ ही महामना मदन मोहन मालवीय जी को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के दौरान कई बार जेल जाना पड़ा। लेकिन इसके बाद भी इस वीर ने अपने देश सेवा के व्रत को नहीं छोड़ा।