शहादत -ए – ख़ामनेई: मर के जीना सीखा दिया तूने 

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   तनवीर जाफ़री-पूरे विश्व को अशांति की आग में झोंकने वाले अमेरिका व उसके क्रूर सहयोगी मित्र इस्राईल द्वारा आख़िरकार ईरान पर एक बार फिर युद्ध थोप कर वहां भारी नरसंहार की इबारत लिखी जा रही है। अमेरिका व इस्राईल जैसे परमाणु हथियार रखने वाले देशों का कहना है कि परमाणु हथियार रखना केवल उन जैसे ‘जन संहारक’ देशों का ही एकाधिकार है। अमेरिका के इशारों पर नाचने से इंकार करने व उसे ‘सर्वशक्तिमान ‘ स्वीकार करने वाले ईरान जैसे देश का तो हरगिज़ नहीं। वैसे तो अब तक ईरान भी परमाणु हथियार बनाने से इंकार करता रहा है। परन्तु इराक़ की ही तरह इसी बात को बहाना बनाकर अमेरिका व इस्राईल ईरान पर टूट पड़े हैं। ईरान से रोज़ाना भारी जनहानि की ख़बरें आ रही हैं। जैसे जैसे युद्ध लंबा होता जा रहा है वैसे वैसे अमेरिका के हौसले पस्त होते जा रहे हैं और वह और भी अधिक आक्रामकता दिखाकर आम लोगों पर बंबारी कर अपनी खीज उतार रहा है। ठीक इसके विपरीत अपने सर्वोच्च गुरु अयातुल्लाह सैय्यद अली ख़ामनेई की शहादत जैसी बड़ी क़ुर्बानी देने तथा लगभग 170 स्कूली बच्चियों की शहादत के बाद भी ईरानी जनता का जज़्बा-ए-शहादत और भी सर चढ़ कर बोल रहा है। अमेरिका-इस्राईल के विरुद्ध व मौजूदा ईरानी सत्ता के समर्थन में राजधानी तेहरान सहित ईरान के विभिन्न शहरों में लाखों लोग दिन रात अपने बुलंद हौसलों के साथ ईरानी सैनिकों के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं। लाखों प्रदर्शनकारी तो शहीद होने के जज़्बे के साथ अपने शरीर पर कफ़न लपेटकर प्रदर्शन करते देखे गये। तेहरान में तो ऐसी ही एक बड़ी रैली पर इस्राईल द्वारा बंबारी भी की गयी। परन्तु ईरानियों के हौसले और बुलंद होते जा रहे हैं।  read more:https://pahaltoday.com/conflict-fueled-by-demands-for-surrender-will-this-war-be-long-and-destructive/

 निःसंदेह अमेरिका व इस्राईल के दबाव में पश्चिमी मीडिया दशकों से यह नरेटिव प्रसारित करता रहा है कि ईरानी सत्ता कट्टरपंथी है,यह सुन्नी जगत को निगल जाना चाहती है,अरब देशों के लिये ईरान सबसे बड़ा ख़तरा है,केवल अमेरिका ही ईरान से अरब देशों की रक्षा कर सकता है आदि आदि। और अरब देशों को ईरान का ही भय दिखाकर अमेरिका ने मध्य पूर्व के अरब लीग सदस्य देशों में लगभग 15 से 20 के मध्य स्थायी और प्रमुख सुविधाओं वाले सैन्य ठिकाने बना रखे हैं। यहाँ अमेरिकी सैनिकों की तैनाती 40,000 से 50,000 के आसपास है। क़तर,बहरीन,कुवैत,संयुक्त अरब अमीरात,सऊदी अरब,जॉर्डन,इराक़,मिस्र,सीरिया के अतिरिक्त कई छोटे काउंटर-टेररिज़्म बेस भी शामिल हैं। जबकि ओमान जैसे कई  देशों में अमेरिका की एक्सेस या पोर्ट सुविधाएं मौजूद हैं, हालांकि यहाँ पूर्ण अड्डे नहीं हैं। इन भारी भरकम सैन्य मौजूदगी के बल पर ही अमेरिका व इस्राईल अधिकांश खड़ी देशों को अपने कुचक्र में उलझाकर उनके तेल भंडारों का अपनी मनमर्ज़ी से ज़बरदस्त दोहन कर रहे थे तथा उनकी सुरक्षा के नाम पर अरब देशों से भरी भरकम वसूली कर रहे थे। इतना ही नहीं बल्कि ईरान का भय दिखाकर ही बड़े ही नियोजित तरीक़े से इन्हीं देशों को अमेरिका व इस्राईल अपने हथियार बेचते रहते थे।  read more:https://khabarentertainment.in/a-dispute-over-buffalo-milking-led-to-allegations-of-assault-against-several-people-including-a-home-guard-four-people-were-injured-and-the-video-went-viral/   परन्तु गत 28 फ़रवरी को पवित्र रमज़ान के महीने में अमेरिका व इस्राईल द्वारा ईरान पर किये गये आक्रमण में और युद्ध छिड़ते ही ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह सैय्यद अली ख़ामनेई की शहादत ने न केवल अमेरिका व इस्राईल के अरमानों पर पानी फेर दिया बल्कि पूरे अरब जगत की आँखें भी खोलकर रख दीं। ईरान पहले ही कह चुका था कि यदि उसपर अमेरिका का हमला हुआ तो वह मध्य पूर्व में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को सबसे पहले निशाना बनायेगा। क्योंकि इन्हीं सैन्य अड्डों का इस्तेमाल अमेरिका व इस्राईल द्वारा ईरान के विरुद्ध किया जा रहा था। लिहाज़ा सामरिक दृष्टिकोण से भी यही सैन्य अड्डे ईरान के निशाने पर थे। और वही हुआ कि अमेरिका-इस्राईल के हमले के जवाब में  ईरान ने इन्हीं अमेरिकी सैन्य ठिकानों को सबसे पहले निशाना बनाया। ईरान के दावों के अनुसार नहीं बल्कि द न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित उसके गत 11 मार्च के विश्लेषण के मुताबिक़ मध्य पूर्व में ईरान के हमलों से कम से कम 17 अमेरिकी सैन्य, राजनयिक और वायु रक्षा स्थलों को भारी नुक़्सान पहुंचा है। ये हमले मुख्य रूप से बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, क़तर और यूएई सहित खाड़ी देशों में स्थित ठिकानों पर किये गये। इनमें अनेक अमेरिकी सैनिक मारे गए व कई घायल हुये। इसके बाद अमेरिका ने उन प्रभावित सैन्य ठिकानों से अपने तमाम सैनिकों को वापस बुला लिया। और जिन अरब देशों की सुरक्षा के नाम पर गत 4 दशकों से ग़लतफ़हमी का शिकार बना रखा था उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। इतना ही नहीं बल्कि अमेरिका ने अपने नागरिकों को एक एडवाइज़री जारी कर उन्हें सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात,कुवैत,क़तर,बहरीन,ओमान,जॉर्डन,मिस्र,लेबनान,यमन,इराक़ तथा सीरिया जैसे देशों को तत्काल छोड़ने की सलाह भी दे दी। read more:https://khabarentertainment.in/ankit-became-a-champion-after-defeating-tb-and-now-a-ray-of-hope-for-others/ अमेरिका द्वारा पीठ दिखाने के बाद पूरा इस्लामी जगत यह सोचने के लिये मजबूर हो गया कि वास्तव में अमेरिका द्वारा जिस ईरान को अरब देशों के लिये ख़तरा बताया जा रहा था वह ईरान नहीं बल्कि ख़ुद अमेरिका ही उनके लिये सबसे बड़ा ख़तरा है। ख़ामनेई की शहादत के बाद जिस तरह पूरे विश्व की अनेक सांसदों व विधानसभाओं में सड़कों व बाज़ारों में ख़ामनेई को श्रद्धांजलि पेश की गयी और साथ ही पूरे विश्व में शिया सुन्नी एकता के जो लहर दिखाई दे रही है उसकी तो अमेरिका ने कल्पना भी नहीं की होगी। आज केवल दुनिया के मुसलमान ही नहीं बल्कि क्रूर व शुद्ध व्यवसायी मानसिकता रखने वाले अमेरिकी साम्राजयवाद से त्रस्त आ चुकी पूरी दुनिया आयतुल्ला ख़ामनेई की शहादत को इसी लिये सलाम कर रही है कि उन्होंने शहीद होकर न केवल विश्वसतर पर शिया सुन्नी की उस खाई को पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जो अमेरका व इस्राईल द्वारा ही गहरी की गयी थीं बल्कि उन्होंने अमेरिकी के आगे घुटने टेकने से इंकार कर यह भी बता दिया कि ब्रह्माण्ड में सर्वशक्तिमान कोई अमेरिका जैसा देश या उसका कोई सनकी राष्ट्रपति नहीं बल्कि वही है जो ‘सबका मालिक’ है और वह एक है और वही सबके लिये ‘सर्वशक्तिमान’ है। आयतुल्लाह ख़ामनेई की शहादत पर श्रद्धांजलि स्वरूप कुंवर महेंद्र सिंह बेदी “सहर ” द्वारा कही गयी यह पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं – जी के मरना तो सब को आता है।  मर के जीना सीखा दिया तूने।

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