डॉ. अंशुल उपाध्याय:अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर बड़े हमले किए गए। जिनका मुख्य कारण ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकना, उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को नष्ट करना और क्षेत्र में ईरानी शासन के खतरों को समाप्त करना बतलाया गया है। अमेरिका ने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के खतरों को खत्म करने और मध्य पूर्व में ईरानी प्रभाव को कम करने के लिए ये सैन्य कार्रवाई की। इस कार्यवाही में (अयातुल्ला अली खामेनेई) जो कि ईरान के सरगना थे मारे गए। फिर भी अमेरिका ने इस्फ़हान, कराज, करमानशाह, क़ुम और तब्रीज़ में सैन्य ठिकानों को निशाना बनाकर अतिरिक्त हमले किए। जिसके बाद ईरान ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए बहरीन, कुवैत, कतर और संयुक्त अरब अमीरात सहित पूरे मध्य पूर्व में इज़राइल और अमेरिकी ठिकानों पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं ।ईरानी परमाणु कार्यक्रम का इतिहास और सचईरान कम से कम 1957 से परमाणु कार्यक्रम चला रहा है, जिसमें उसे अलग-अलग स्तर की सफलता मिली है। ने 1990 के दशक में इस कार्यक्रम के अनुसंधान में सहयोग के लिए चीन और रूस के साथ कई समझौते किए। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए अन्य देशों के द्वारा भी गहन प्रयास किए गए । जिसके लिए ईरान सहमत तो हो गया, लेकिन उसने केवल परमाणु ऊर्जा के लिए अपने सेंट्रीफ्यूज रखने पर जोर दिया। हालांकि, उसने आईएईए को पारदर्शी रिपोर्टिंग करने की अपनी प्रतिबद्धता का पालन नहीं किया और गुप्त गतिविधियां जारी रखीं परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में मामला भेज दिया गया ।जिसके बाद ईरान पर कई प्रतिबंध लगाए गए 2011 और 2015 के बीच, अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बढ़ते प्रभावों के कारण ईरान की स्थिति बिगड़ गई। और वहां की अर्थव्यवस्था गिर गई साथ ही बेरोजगारी चरम सीमा पर पहुंच गई। इसके बाद ईरान में हसन रूहानी सरकार के सत्ता में आ जाने के बाद 2015 में जेसीपीओ (JCPOA) पर हस्ताक्षर किए गए थे। प्रमुख पक्षों द्वारा समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इसे मंजूरी दे दी।संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 2231 , प्रतिबंधों में राहत का मार्ग प्रशस्त करता है।हालांकि जेसीपीओ ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित कर दिया, लेकिन उसकी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएं बढ़ती रहीं। ईरान ने अपनी इन महत्वाकांक्षाओं को जारी रखा।इसके माध्यम से शिया उग्रवादियों को हथियारबंद करना और प्रशिक्षण देना आदि सम्मिलित था।ईरान ने फिलिस्तीनी आतंकवादी समूह हमास को वर्षों तक सैन्य सहायता और प्रशिक्षण प्रदान किया था , जिसके चलते 7 अक्टूबर, 2023 को हमास ने इज़राइल पर हमला किया था।ट्रंप प्रशासन और ईरान के संबंध ट्रम्प प्रशासन ने ईरान को दबाव में लाने के लिए अधिकतम दबाव की रणनीति अपनाई। बातचीत की मेज पर , ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर जेसीपीओ के प्रतिबंधों का उल्लंघन करना शुरू कर दिया, जिससे तनाव बढ़ गया। अप्रैल 2019 में, संयुक्त राज्य अमेरिका ने आईआरजीसी को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। 2024 में हुए ईरान इजराइल युद्ध के बाद अमेरिका ने इजराइल का सहयोग करते हुए ईरान के कई ठिकानों पर हमले किए।ईरान के तेल के ठिकानों, रक्षा उपकरणों के उत्पादन केंद्र को भी निशाना बनाने की बात ट्रंप प्रशासन द्वारा की गई है।भारत का पक्षएक और जब भारत एशिया की उभरती हुई महाशक्ति बनने जा रहा है ऐसे में अमेरिका और ईरान के मध्य ये जंग सम्पूर्ण विश्व को ऊर्जा संकट में डालने के लिए काफ़ी हैं। एक ओर जहां भारत और इजराइल संबंधो की घनिष्ठता है दूसरी और अमेरिका के साथ भी हमारे संबंध पहले से बेहतर होते जा रहे हैं अब ईरान के साथ भी भारत के व्यापारिक संबंध है। इन हालातों में भारत को शांति का ही पक्षधर बनना उचित होगा। विवाद के समाधान के लिए दोनों पक्षों को आपस मे बैठकर मुद्दे सुलझाने होगे। क्योंकि अगर अमेरिका नहीं रुका तो ईरान को सहयोग देने वाले राष्ट्र भी ईरान के कंधे में बंदूक रखकर चलाएंगे और संपूर्ण एशिया में भयंकर तबाही होगी आने वाले कई सालों का ईंधन चंद दिनों में धू धू कर के जल जाएगा। जिन ऊर्जा संसाधनों के लिए युद्ध हो रहे हैं यदि उनके श्रोत ही नष्ट कर दिये गए तो फिर हमारे हाथ में राख के ढेर के सिवा आखिर क्या बचेगा।