भारत के साइबर अपराधी सबसे ज्यादा अमेरिकियों को लूटते हैं

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स्नेहा सिंह –भारत में एक तरफ बेरोजगारी का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर बेरोजगार लोग अपराध की ओर धकेले जा रहे हैं। हाल ही में आई अमेरिकी एजेंसी एफबीआई की रिपोर्ट में बताया गया है कि साइबर अपराध के जरिए अमेरिकियों के साथ पिछले साल लगभग 16 अरब डालर की ठगी की गई। इसमें सबसे ज्यादा अपराध भारत में चल रहे कॉल सेंटरों द्वारा किए गए हैं। इस रिपोर्ट में सबसे पहले नाम छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का आता है। जिस तरह झारखंड का जामताड़ा ऑनलाइन ठगी के लिए बदनाम है, उसी तरह अब रायपुर भी चर्चा में आ गया है।इस शहर में अपराध बढ़ने का कारण युवाओं की मानसिकता नहीं, बल्कि मजबूरी है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी उन्हें सामान्य रोजगार नहीं मिलता, जिससे वे बेरोजगारी और लाचारी से जूझते रहते हैं। ऐसे में साइबर अपराधी उनका फायदा उठाते हैं। केवल रायपुर के फर्जी कॉल सेंटरों द्वारा अमेरिकियों से 1.56 लाख करोड़ रुपए ठगे गए हैं। यह तो केवल एक शहर की बात है।हैरानी की बात यह है कि इस अपराध में दिल्ली, एनसीआर, मुंबई, हैदराबाद, बेंगलुरु और पुणे जैसे बड़े शहरों का ज्यादा नाम नहीं आता, जबकि लखनऊ, कोलकाता, श्रीनगर और पंजाब के कुछ शहरों और गांवों से बड़े पैमाने पर साइबर अपराध किए जा रहे हैं।एफबीआई की रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि 16 अरब डालर में से अधिकांश ठगी भारतीय फर्जी कॉल सेंटरों द्वारा की गई है। इन कॉल सेंटरों को साइबर अपराध का एपिसेंटर बताया गया है। अपराधी खुद को अमेरिकी टेक सपोर्ट, बैंक अधिकारी या कस्टमर केयर अधिकारी बताकर लोगों को ठगते हैं और खासतौर पर बुजुर्ग अमेरिकियों को निशाना बनाते हैं।एफबीआई और भारतीय जांच एजेंसी सीबीआई पिछले दो वर्षों से मिलकर इस मामले की जांच कर रही हैं। विभिन्न शहरों और गांवों में छापेमारी की जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार 2024 में 11 सर्च ऑपरेशन किए गए, जिनमें 215 लोगों को गिरफ्तार किया गया। 2023 की तुलना में यह संख्या 700 गुना अधिक थी।हाल ही में रायपुर में क्राइम ब्रांच ने छापा मारकर एक गिरोह पकड़ा, जहां फाइनेंस कंपनी के नाम पर फर्जी कॉल सेंटर चल रहा था। 41 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया और 25 कंप्यूटर, 18 लैपटॉप और 50 से अधिक स्मार्टफोन जब्त किए गए।रिपोर्ट के अनुसार कोरोना काल से पहले दिल्ली में ऐसे हजारों कॉल सेंटर चल रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे ये छोटे शहरों में शिफ्ट हो गए। यहां 12वीं पास या कालेज छोड़ चुके युवाओं को इसमें शामिल किया जा रहा है। उन्हें हिंदी में स्क्रिप्ट दी जाती है, जिसे अंग्रेजी में अनुवाद कर वे ठगी करते हैं।चिंताजनक बात यह है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। बीपीओ उद्योग के बढ़ने के साथ ही अपराधियों ने इसी माडल को ठगी का साधन बना लिया।सबसे बड़ा कारण बेरोजगारी है। इंडिया एम्प्लायमेंट रिपोर्ट 2024 के अनुसार 15 से 29 वर्ष के युवाओं में नौकरी की भारी कमी है। लगभग 70 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। हर साल करीब 50 लाख ग्रेजुएट होते हैं, लेकिन उनमें से केवल आधे को ही नौकरी मिलती है।अंग्रेजी जानने वाले युवाओं को ज्यादा लालच देकर इन कॉल सेंटरों में रखा जाता है। सस्ती इंटरनेट सेवाएं, वीओआईपी और क्लाउड तकनीक भी इस अपराध को बढ़ावा दे रही हैं।भारत में कई साइबर अपराध नेटवर्क पकड़े जा चुके हैं। 2016 में महाराष्ट्र के ठाणे में एक कॉल सेंटर पर छापा पड़ा, जहां 700 कर्मचारी काम करते थे और आईआरएस अधिकारी बनकर अमेरिकियों को ठगते थे। जांच में सामने आया कि इस कॉल सेंटर ने 30,000 करोड़ रुपए की ठगी की थी।
2024 में पुणे, हैदराबाद और विशाखापट्टनम में भी फर्जी कॉल सेंटर पकड़े गए। ये माइक्रोसॉफ्ट टेक सपोर्ट बनकर लोगों के कंप्यूटर हैक करते थे और पैसे वसूलते थे।विशेषज्ञों के अनुसार, ये कॉल सेंटर आमतौर पर 500 से 5000 डालर तक की ठगी करते हैं। बुजुर्गों और कर्जदारों को ज्यादा निशाना बनाया जाता है। छोटी रकम होने के कारण लोग शिकायत भी नहीं करते।पहले व्यक्ति का भरोसा जीतते हैं, फिर उसे डराकर पैसे वसूलते हैं। यह पैसा फर्जी खातों, हवाला नेटवर्क या क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भारत लाया जाता है। इस तरह पूरी साइबर ठगी की व्यवस्था काम करती है।

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