डॉ. सत्यवान सौरभ।-होली केवल एक त्योहार नहीं, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना का उत्सव है। यह रंगों का, उल्लास का, मन की गांठें खोलने का और रिश्तों में जमी धूल झाड़ने का अवसर है। किंतु समय के साथ हर परंपरा नए प्रश्नों के घेरे में आती है। आज जब विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर होली के आयोजन का स्वरूप बदल रहा है, तब समाज का एक वर्ग उत्साहित है तो दूसरा वर्ग चिंतित। यही द्वंद्व इस चर्चा को गंभीर बनाता है।परंपरागत रूप से होली को पारिवारिक और सामुदायिक दायरे में मनाया जाता रहा है। गाँवों में चौपाल, मोहल्लों में आँगन, घरों की छतें—ये सब उत्सव के स्वाभाविक मंच होते थे। रिश्तों की परिभाषाएँ स्पष्ट थीं; देवर-भाभी की हँसी-ठिठोली, ननद-भाभी की चुहल, मित्रों का रंग-अबीर। इन सबमें एक सांस्कृतिक मर्यादा और सामाजिक संदर्भ निहित रहता था। त्योहार का आनंद सामूहिक था, पर सीमाएँ भी स्पष्ट थीं।आज दृश्य बदल चुका है। सहशिक्षा वाले विश्वविद्यालयों में छात्र-छात्राएँ साथ पढ़ते हैं, साथ कार्यक्रम आयोजित करते हैं और साथ ही उत्सव भी मनाते हैं। सोशल मीडिया के दौर में उत्सव केवल निजी अनुभव नहीं रह गया, वह सार्वजनिक प्रदर्शन का रूप ले लेता है। रंग, संगीत, नृत्य और भीड़—ये सब मिलकर एक ऐसा माहौल रचते हैं जो पारंपरिक होली से भिन्न दिखाई देता है। यही बदलाव समाज के एक हिस्से को असहज करता है।मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि लड़कियाँ होली क्यों खेल रही हैं या लड़के क्यों साथ हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या उत्सव की आड़ में मर्यादा और गरिमा सुरक्षित है? क्या स्वतंत्रता के नाम पर अराजकता को स्थान मिल रहा है? क्या भीड़ के उत्साह में व्यक्तिगत सीमाएँ टूट रही हैं?यहाँ “लड़की” और “स्त्री” के बीच का अंतर भी चर्चा में आता है। समाज अक्सर बेटियों को बचपन से ही मर्यादा का पाठ पढ़ाता है, जबकि बेटों को अधिक खुली छूट मिलती रही है। जब बेटियाँ सार्वजनिक रूप से उत्सव में भाग लेती हैं, तो उसे परंपरा से विचलन मान लिया जाता है। पर क्या यह दृष्टिकोण न्यायसंगत है? यदि शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में समान अवसर स्वीकार हैं, तो सांस्कृतिक आयोजनों में समान भागीदारी क्यों नहीं?दूसरी ओर, यह भी उतना ही सत्य है कि भीड़ का व्यवहार हमेशा संयमित नहीं होता। होली के अवसर पर छेड़छाड़, जबरदस्ती रंग लगाने, अभद्र टिप्पणियों जैसी घटनाएँ वर्षों से समाज की चिंता का विषय रही हैं। ऐसे में अभिभावकों की आशंका को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। उनकी चिंता केवल परंपरा की रक्षा की नहीं, बल्कि बेटियों की सुरक्षा और गरिमा की भी होती है।यहाँ “सहमति” की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। आधुनिक समाज में किसी भी सामाजिक संपर्क का आधार स्पष्ट सहमति है। यदि कोई छात्रा या छात्र अपनी इच्छा से, सुरक्षित वातावरण में उत्सव का हिस्सा बनता है, तो उसे केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता कि वह परंपरागत ढाँचे से अलग है। लेकिन यदि आयोजन में सुरक्षा, निगरानी और स्पष्ट आचार-संहिता का अभाव है, तो चिंता स्वाभाविक है।विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका यहाँ निर्णायक हो जाती है। किसी भी सामूहिक आयोजन में सुरक्षा व्यवस्था, शिकायत तंत्र और स्पष्ट दिशा-निर्देश अनिवार्य होने चाहिए। यह सुनिश्चित करना प्रशासन का दायित्व है कि कोई भी छात्र या छात्रा असहज महसूस न करे। “नो मींस नो” जैसी स्पष्ट नीति और उसकी सख्ती से पालना उत्सव को स्वस्थ बनाए रख सकती है।समाज को भी आत्ममंथन की आवश्यकता है। क्या हम बेटियों को केवल घर की मर्यादा से जोड़कर देखते हैं? क्या हम यह मान बैठे हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर उनका सक्रिय होना स्वभावतः अनुचित है? यदि बेटियाँ शिक्षा, खेल, राजनीति और व्यवसाय के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तो सांस्कृतिक आयोजनों में उनकी उपस्थिति को अलग कसौटी पर क्यों परखा जाए?परंपरा स्थिर नहीं होती; वह समय के साथ बदलती है। जो आज “नया” प्रतीत हो रहा है, वह कल सामान्य बन सकता है। किंतु परिवर्तन का अर्थ मूल्यों का परित्याग नहीं है। मर्यादा, सम्मान और सुरक्षा—ये मूल्य शाश्वत हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम इन मूल्यों को नए परिवेश में लागू करने के लिए तैयार हैं?होली का मूल संदेश सामाजिक भेद मिटाना है। यह वह दिन है जब रंग सबको एक कर देते हैं—जाति, वर्ग, आयु, लिंग के भेद पीछे छूट जाते हैं। यदि हम इस मूल भावना को स्वीकार करते हैं, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि बेटियाँ और बेटे दोनों समान रूप से इस उत्सव का हिस्सा हैं।फिर भी, उत्सव को प्रदर्शन में बदल देना चिंता का विषय है। सोशल मीडिया पर लाइक और व्यूज़ की दौड़ में निजी क्षणों का सार्वजनिक प्रदर्शन कई बार गरिमा की सीमा लांघ देता है। युवाओं को यह समझने की आवश्यकता है कि आत्मविश्वास और आत्मप्रदर्शन में अंतर होता है। आनंद का अर्थ यह नहीं कि हर क्षण कैमरे के लिए जिया जाए।अभिभावकों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। केवल रोक-टोक समाधान नहीं है। संवाद, विश्वास और जागरूकता अधिक प्रभावी साधन हैं। यदि बेटियों को बचपन से ही आत्मसम्मान, आत्मरक्षा और स्पष्ट सीमाएँ तय करने का संस्कार दिया जाए, तो वे किसी भी वातावरण में स्वयं की गरिमा की रक्षा कर सकती हैं। उसी प्रकार बेटों को भी यह सिखाया जाना चाहिए कि उत्सव का आनंद दूसरों की असुविधा पर आधारित नहीं हो सकता।समाज को यह स्वीकार करना होगा कि नई पीढ़ी अलग सामाजिक संरचना में जी रही है। सहशिक्षा, डिजिटल मीडिया और वैश्विक प्रभावों ने उनके अनुभवों को व्यापक बना दिया है। ऐसे में पुरानी परिभाषाओं को ज्यों-का-त्यों लागू करना संभव नहीं। परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि नई पीढ़ी परंपरा की जड़ों से जुड़ी रहे।संतुलन ही समाधान है। न अंधानुकरण, न अंधविरोध। यदि विश्वविद्यालयों में होली का आयोजन होता है, तो उसे सुरक्षित, गरिमापूर्ण और स्वैच्छिक बनाया जाए। यदि कोई छात्र या छात्रा भाग नहीं लेना चाहता, तो उस पर दबाव न डाला जाए। यदि कोई भाग लेना चाहता है, तो उसकी स्वतंत्रता का सम्मान किया जाए।अंततः प्रश्न केवल होली का नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का है। क्या हम स्वतंत्रता को संदेह की दृष्टि से देखेंगे, या उसे जिम्मेदारी के साथ स्वीकार करेंगे? क्या हम बेटियों को केवल संरक्षण की वस्तु मानेंगे, या उन्हें सक्षम और सजग नागरिक के रूप में देखेंगे?
होली का रंग तभी स्थायी होगा जब उसमें विश्वास और सम्मान की खुशबू हो। परंपरा और आधुनिकता का संघर्ष तब समाप्त होगा जब हम समझेंगे कि दोनों का उद्देश्य समाज को बेहतर बनाना है।
त्योहारों का अर्थ केवल रस्में निभाना नहीं, बल्कि समय के साथ स्वयं को परखना भी है। यदि हम मर्यादा, गरिमा और सहमति को केंद्र में रखकर उत्सव मनाएँ, तो न तो परंपरा आहत होगी और न आधुनिकता।
समाज की प्रगति इसी में है कि वह अपनी जड़ों को संभालते हुए नई शाखाओं को फैलने दे। रंगों का यह पर्व हमें यही सिखाता है कि विविधता में भी समरसता संभव है—बस दृष्टिकोण संतुलित होना चाहिए।