“खाड़ी की आग और भारत: कूटनीति की कसौटी पर सरकार, अवसरवाद में डूबा विपक्ष”

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डा.संतोष सिंह
राष्ट्रीय अध्यक्ष, विश्व वैदिक सनातन न्यास

खाड़ी क्षेत्र एक बार फिर बारूद के ढेर पर बैठा है। तेल, सामरिक मार्ग और वैश्विक शक्तियों के टकराव ने इस पूरे इलाके को ऐसा युद्धक्षेत्र बना दिया है, जिसका असर केवल सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। भारत, जो ऊर्जा, व्यापार और प्रवासी भारतीयों के कारण खाड़ी से गहराई से जुड़ा है, इस संकट के सीधे प्रभाव से अछूता नहीं रह सकता।भारत पर सीधा प्रभाव: महंगाई, ऊर्जा और सुरक्षा संकट सबसे पहला और सीधा असर तेल की कीमतों पर पड़ता है। खाड़ी में जरा सा तनाव बढ़ते ही कच्चे तेल की कीमतें आसमान छूने लगती हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में हर बढ़ती कीमत आम जनता की जेब पर बोझ बन जाती है। पेट्रोल-डीजल महंगे होते हैं, परिवहन खर्च बढ़ता है और अंततः महंगाई की मार हर घर तक पहुंचती है।दूसरा बड़ा संकट है खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों का। युद्ध की स्थिति में उनकी सुरक्षा, रोजगार और वापसी एक बड़ी चुनौती बन जाती है। अगर हालात बिगड़ते हैं, तो भारत को बड़े पैमाने पर निकासी अभियान चलाना पड़ सकता है, जैसा अतीत में हो चुका है।तीसरा पहलू है समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा। खाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरने वाले रास्ते भारत के व्यापार की रीढ़ हैं। अगर ये मार्ग असुरक्षित होते हैं, तो निर्यात-आयात दोनों प्रभावित होंगे, जिससे आर्थिक दबाव और बढ़ेगा।भारत सरकार की भूमिका: संतुलन की कूटनीति या मजबूरी?भारत सरकार इस पूरे संकट में “संतुलित कूटनीति” का रास्ता अपना रही है। एक ओर वह अपने पारंपरिक मित्र देशों से संबंध बनाए रखना चाहती है, तो दूसरी ओर वैश्विक शक्तियों के साथ भी संतुलन साधने की कोशिश कर रही है।सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं—ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो प्रवासी भारतीय सुरक्षित रहें भारत किसी भी सैन्य गठजोड़ में सीधे न फंसे लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह कूटनीति सक्रिय है या केवल प्रतिक्रियात्मक?
क्या भारत केवल घटनाओं के अनुसार निर्णय ले रहा है, या वह क्षेत्रीय शांति में कोई निर्णायक भूमिका निभा सकता है? भारत ने खुद को एक “जिम्मेदार वैश्विक शक्ति” के रूप में प्रस्तुत किया है, लेकिन इस संकट में उसकी भूमिका अभी भी सीमित और सतर्क दिखाई देती है। यह सतर्कता समझदारी भी हो सकती है और अवसर चूकने की कमजोरी भी। विपक्ष का रवैया: राष्ट्रीय संकट या राजनीतिक अवसर?जहां एक ओर देश एक बड़े अंतरराष्ट्रीय संकट का सामना कर रहा है, वहीं विपक्ष का रवैया सवालों के घेरे में है। विपक्ष का काम सरकार से जवाब मांगना है, लेकिन वर्तमान स्थिति में कई बार यह आलोचना “रचनात्मक” कम और “राजनीतिक अवसरवाद” ज्यादा लगती है।तेल की कीमतों को लेकर सरकार पर हमला करना आसान है, लेकिन क्या विपक्ष ने कोई ठोस वैकल्पिक नीति दी है?प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा पर सवाल उठाना जरूरी है, लेकिन क्या विपक्ष ने सरकार के साथ मिलकर कोई राष्ट्रीय रणनीति बनाने की पहल की?ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष इस संकट को एक गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे के बजाय राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने में अधिक रुचि रखता है।बड़ी तस्वीर: भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों खाड़ी युद्ध केवल खतरा नहीं, बल्कि एक अवसर भी है—भारत वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर तेजी से काम कर सकता है वैश्विक मंच पर शांति मध्यस्थ के रूप में अपनी भूमिका मजबूत कर सकता है अपनी कूटनीति को और अधिक आत्मनिर्भर और निर्णायक बना सकता है लेकिन इसके लिए केवल सरकार नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की परिपक्वता जरूरी है।निष्कर्ष: समय है राष्ट्रीय एकता और स्पष्ट रणनीति का खाड़ी की आग भारत के दरवाजे तक धुआं पहुंचा रही है। यह समय है जब देश को एकजुट होकर अपनी रणनीति तय करनी चाहिए।सरकार को अधिक सक्रिय, दूरदर्शी और निर्णायक बनना होगा।विपक्ष को आलोचना के साथ-साथ समाधान भी देना होगा।क्योंकि यह केवल विदेश नीति का सवाल नहीं है—यह भारत की आर्थिक स्थिरता, वैश्विक छवि और राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।और ऐसे समय में राजनीति नहीं, राष्ट्रनीति की जरूरत होती है।

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