जयगुरुदेव आश्रम पर मेला शुरू

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मथुरा, जयगुरुदेव आश्रम मंे आयोजित तीन दिवसीय होली सत्संग मेला में पहले दिन राश्ट्रीय उपदेषक बाबूराम और सतीष चन्द्र जी ने श्रद्धालुओं को सम्बोधित किया। बाबूराम ने बताया कि भारत वर्श में होली पर्व हर्शोल्लास के साथ मनाया जाता है। अनादिकाल से भारत के ऋशियों, मुनियों के द्वारा तीज, त्योहार षुरु किया गया, जिसके भौतिक और आध्यात्मिक उद्देष्य थे। प्रारम्भिक समय में अपने खुषियों को प्रतीक रूप में प्रकट करने के रूप में षुरु हुई। इसके द्वारा लोगों में सामाजिक चेतना जागृति कर प्रेम और सौहार्द कायम रखा गया। पहले के समय में कचनार, पलास आदि प्राकृतिक रंगों से होली खेली जाती थी। जब तक प्राकृतिक रंगों से होली खेलने की परम्परा रही तब तक प्रेम और मर्यादायें कायम रहीं। लेकिन जैसे-जैसे रासायनिक पदार्थों से बने हुये रंगों की होली खेली जाने लगी मर्यादा दूशित हो गई और पर्यावरण खराब होने के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ने लगा। धीरे-धीरे होली के स्वरूप में विकृति आ गई। ब्रज में तरह-तरह से होली खेली जाती है। हमारे गुरु महाराज बाबा जयगुरुदेव जी महाराज ने होली के विकृति स्वरूप में सुधार कर मर्यादित होली खेलने की परम्परा की षुरुआत की। जयगुरुदेव आश्रम में पुरुश-पुरुशों को और महिलायें-महिलाओं को ब्रज की पावन रज को माथे पर लगा कर, गले मिलकर और एक-दूसरे से भूल-चूक की माफी मांगते हैं। इस त्योहार पर बुराईयों को छोड़ने का और पुनः गलती नहीं करने का संकल्प लेते हैं। उन्होंने रामचरित मानस की पंक्ति ‘‘देह धरै का यह फल भाई, भजिअ राम सब काज बिहाई’’ को उद्धृत करते हुये कहा कि हम लोग मनुश्य षरीर में चन्द रोजा के मुसाफिर हैं। इस संसार की कामनाओं, इच्छाओं को त्याग कर गृहस्थ आश्रम में रहकर नाम (सुरत-षब्द) की कमाई कर अपनी जीवात्मा को निर्मल चैतन्य देष में पहुँचा दें। षब्द की धार पर जीवात्मायें नीचे के मण्डलों पर उतारी गई हैं। अन्त में मृत्युलोक में चेतन जीवात्मा को जड़ मसालों में बन्द कर दिया गया। षरीर जड़ है और जीवात्मा चेतन है। जिस प्रकार इलेक्ट्रिक उपकरणों में जब तक बिजली की आपूर्ति होती रहती है, उपकरण काम करते हैं, ठीक उसी प्रकार जब तक चेतन जीवात्मा षरीर में है, षरीर के अंग काम करते हैं। जीवात्मा के अभाव में बिजली के उपकरण के समान षरीर बेकार है।
राश्ट्रीय उपदेषक सतीष चन्द ने पिछले युगों की साधनाओं पर प्रकाष डालते हुये बताया कि कलयुग में सुरत षब्द योग साधना से जीवों का कल्याण होगा। ‘जयगुरुदेव’ समय का जगाया हुआ नाम है। मौत के समय जयगुरुदेव नाम स्मरण से जीवों की सम्भाल होगी। मेले में श्रद्धालुओं के आने का क्रम जारी है। उत्तर प्रदेष के विभिन्न जिलों, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेष, हरियाणा, पंजाब, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराश्ट्र, गुजरात और नेपाल राश्ट्र आदि जगहों से भारी संख्या में श्रद्धालु आये हुये हैं। सभी जिलों एवं प्रान्तों के भोजन भण्डारों (लंगरों) में लोगों की भीड़ लगी हुई है।

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