डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा-रामपुर खास गाँव के स्वघोषित तकनीकी चाणक्य ‘झपटल सिंह’ ने जब इस बार प्रधानी का बिगुल फूँका, तो उन्होंने गेहूँ-चावल के पुराने ढर्रे को ही बदल दिया। उनका नया चुनावी शगूफा था—’डिजिटल डाइट और वर्चुअल पेट-पूजा योजना’। झपटल सिंह का तर्क था कि असली भूख पेट की नहीं, बल्कि मन की होती है, और जब पूरी दुनिया ‘मेटावर्स’ में जा रही है, तो गाँव का आदमी थाली में असली रोटी क्यों ढूँढ रहा है? उन्होंने घोषणा की कि जीतते ही वे हर घर को एक ‘वीआर चश्मा’ (VR Headset) देंगे, जिसे पहनते ही फटी हुई सूखी रोटी भी मखनी पनीर और शाही पुलाव नजर आएगी। गाँव के लोग, जो साल भर की महंगाई से त्रस्त थे, अचानक इस ‘विजुअल डाइट’ के जादू पर ऐसे रीझे कि उन्हें लगने लगा कि अब बिना चूल्हा जलाए ही दावतें उड़ाई जा सकेंगी और राशन कार्ड की सड़ांध से भी मुक्ति मिल जाएगी।प्रचार के अंतिम पड़ाव पर झपटल सिंह ने गाँव के खंडहर हो चुके स्कूल में एक ‘डिजिटल रसोई’ स्थापित की। यह वास्तव में एक पुराना कबाड़ हो चुका फ्रिज था, जिसे उन्होंने एल्युमिनियम फॉयल से लपेट कर ‘सुपर कंप्यूटर’ घोषित कर दिया था। उन्होंने दावा किया कि जो भी व्यक्ति उन्हें वोट देने का संकल्प लेकर इस फ्रिज के सामने अपनी जीभ बाहर निकालेगा, उसे ‘बादाम के हलवे’ का आभासी स्वाद (Virtual Taste) तुरंत महसूस होगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘बुधई राम’ सरकारी खाद और बीज की घिसी-पिटी बातें कर रहे थे, लेकिन जनता को तो उस भविष्य की चिंता थी जहाँ उन्हें बिना डकार लिए ही ‘तृप्ति’ मिल रही थी। झपटल सिंह ने कुछ किराए के लड़कों को बुलाकर गाँव में यह अफवाह फैला दी कि उन्होंने स्वर्ग के रसोइए से ‘रेसिपी डेटा’ चुरा लिया है। लोग अपने खाली कटोरे लेकर उस कबाड़ फ्रिज के सामने कतार में लग गए ताकि उनका ‘डिजिटल डिनर’ कम से कम बुक हो सके।जिस दिन चुनाव का परिणाम आया और झपटल सिंह ने प्रचंड जीत हासिल की, पूरा गाँव अपना ‘डिजिटल राशन’ और वह जादुई चश्मा लेने उनके दरवाजे पर उमड़ पड़ा। लोग चाहते थे कि आज की रात कम से कम ‘वर्चुअल पनीर’ तो नसीब हो। झपटल सिंह अपनी नई चमचमाती स्कॉर्पियो से उतरे और सबके हाथ में एक-एक काला धागा थमाते हुए बोले— “भाइयों, चश्मा तो अभी कस्टम ड्यूटी में फंसा है, तब तक इस धागे को अपनी कमर पर कसकर बांध लो!” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, इससे क्या होगा? हमें तो भूख लगी है!” झपटल सिंह ने चश्मा ठीक किया और ठहाका मारकर बोले, “मूर्खों! यह धागा ही असली ‘मेटावर्स’ है। इसे जितना कसोगे, पेट उतना ही छोटा होगा और तुम्हें भूख का अहसास ही नहीं होगा। जब पेट ही नहीं बचेगा, तो राशन की जरूरत क्या? मैंने तो तुम्हारी भूख का डेटा बेचकर अपनी नई गाड़ी का ‘फुल टैंक’ करवा लिया है।” जनता सन्न खड़ी अपनी कमर का धागा देख रही थी और झपटल सिंह ‘डिजिटल विकास’ की धूल उड़ाते हुए शहर रवाना हो गए।