टिफिन बॉक्स

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा:तेहरान की उस संकरी गली में सूरज की पहली किरण किसी मुजरिम की तरह दाखिल हुई थी। रोशनी का काम तो अंधेरा मिटाना है, लेकिन आज वह मलबे के ढेर पर एक सुराग ढूंढने आई थी—एक नीले रंग का स्कूल बैग और उसके बगल में पड़ा एक आधा मुड़ा हुआ स्टील का टिफिन बॉक्स।शहर के पुलिस रिकॉर्ड में यह शायद ‘केस नंबर 165’ था, लेकिन हकीकत में यह एक अधूरी ‘लंच डेट’ की फाइल थी।सुबह जब रसोई में धुएं के साथ मोहब्बत तैर रही थी, तब ज़हरा की अम्मी ने पराठे की परतों में मक्खन नहीं, अपनी बेटी के सुरक्षित भविष्य की रिश्वत भरी थी। आटे में नमक के साथ-साथ कुछ अनकही दुआएं भी गूंथी गई थीं।ज़हरा ने बस्ता टांगते हुए एक जासूस की फुर्ती से अपनी अम्मी को घेरा था—”अम्मी, आज मरियम जैतून का अचार ला रही है। हमारी सीक्रेट मीटिंग है, थोड़ा जल्दी पैक कर दो न!” अम्मी ने पल्लू से माथा पोंछते हुए एक रहस्यमयी मुस्कान दी, “जा ज़ालिम, पहले दुनिया तो देख ले, फिर अपनी सहेली के साथ दावत करना।”ज़हरा निकल गई। उसे नहीं पता था कि दुनिया देखने का मतलब उस आखिरी धमाके की दहला देने वाली रोशनी को अपनी पुतलियों में संजोकर रखना होगा।read more:https://pahaltoday.com/sdm-arrived-to-investigate-the-complaint-of-diesel-storage/
मलबे के ढेर के पास दो सिपाही खड़े थे। एक सिपाही पत्थर की मूरत बना उस नीले बस्ते को ताक रहा था, जैसे वह बस्ता नहीं, उसकी अपनी धड़कन हो जो कंक्रीट के नीचे दब गई है। दूसरा सिपाही, जो उम्र में छोटा था, भारी जूतों से मलबे को हटाते हुए बोला, “चाचा, ज़रा हाथ बटाओ। ऊपर से हुक्म है कि सूरज ढलने से पहले यह रास्ता साफ़ हो जाना चाहिए। शहर को फिर से ‘ज़िंदा’ दिखाना है।”उम्रदराज सिपाही की आँखों में आँसू नहीं, एक डरावनी खुश्की थी। उसने झुककर उस आधे मुड़े हुए स्टील के टिफिन को उठाया। ढक्कन थोड़ा खुला था, जिससे मिट्टी में सनी हुई एक सूखी रोटी झांक रही थी।उसने कांपते हाथों से उस टिफिन को सीने से लगा लिया और फफक पड़ा, “साफ़ तो तुम सड़क कर दोगे बेटा, पर इस ज़मीन के नीचे दबी उन चीखों का क्या करोगे जो ता-उम्र सुनाई देंगी? यह टिफिन… यह ज़हरा का है।”read more:https://pahaltoday.com/sdm-arrived-to-investigate-the-complaint-of-diesel-storage/ छोटा सिपाही ठिठक गया। उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह अपने सीनियर की आँखों में झांक सके।”आज सुबह ही उसने ज़िद की थी कि अब्बू आज जल्दी घर आना,” बूढ़े सिपाही की आवाज़ मलबे की धूल में घुट रही थी। “वो कह रही थी कि मरियम जैतून का अचार लाएगी, दोनों साथ बैठकर खाएंगी। मैं ड्यूटी पर था, मैंने बस सिर हिला दिया। मुझे क्या पता था कि जिस ज़मीन की हिफाजत की कसम मैंने खाई है, वही ज़मीन मेरी फूल सी बच्ची को निगल जाएगी।”उसने टिफिन के ढक्कन पर जमी धूल को अपनी वर्दी की आस्तीन से साफ़ किया। “देखो, इस पर उसका नाम खुदा है। ऑफिसर कहते हैं कि यह ‘कोलेटरल डैमेज’ है, एक मामूली नुकसान। पर कोई उनसे पूछे कि क्या एक बाप के कलेजे के टुकड़ों को भी अब कागजों पर ‘नुकसान’ लिखा जाएगा?”तभी पास की गली से एक जीप गुजरी, जिसका सायरन सन्नाटे को चीर रहा था। छोटा सिपाही बुदबुदाया, “चाचा, लोग आ रहे हैं… हमें यह सब हटाना होगा। यह हुक्म है।”read more:https://pahaltoday.com/mla-sakendra-verma-met-cm-yogi/बूढ़े बाप ने ज़हरा का वो आखिरी निवाला (रोटी) मिट्टी से निकाला और उसे अपनी मुट्ठी में भींच लिया। उसने अपनी वर्दी की बेल्ट कसी, अपनी टोपी ठीक की और पत्थर दिल बनकर फिर से सिपाही बन गया। पर उसकी आँखों के कोटरों में अब भी वह नीली परछाईं तैर रही थी।जिस हाथ ने सुबह अपनी बेटी को दुआएं देकर घर से विदा किया था, वही हाथ अब शाम को उसी की यादों के मलबे को कचरा समझकर रास्ते से साफ़ कर रहा था।जब शाम के साये गहरे हुए और न्यूज़ चैनलों के कैमरों की लाइटें बुझ गईं, तो उस मलबे के नीचे से एक नन्हीं परछाईं उभरी। उसने अपने उस आधे खुले, मिट्टी से सने डिब्बे को देखा और बुदबुदाई, “अम्मी ने कहा था दुनिया देख लेना, पर यहाँ तो सिर्फ धुआं है। मरियम भी अचार लेकर नहीं आई… क्या आज भी स्कूल का नेटवर्क डाउन है?”उसे क्या पता था कि उसकी अम्मी एक सफेद कफन के नीचे सो रही है।read more:https://pahaltoday.com/sampoorna-samadhan-diwas-was-organized-under-the-chairmanship-of-dm/ अब आप सोच रहे होंगे कि इस कत्लेआम का असली मुजरिम कौन है? वह रणनीतिकार जिसने मिसाइल दागी? वह सिपाही जिसने कर्तव्य के मारे अपनी नन्हीं गुड़िया की टिफिन को कचरा समझा? या वे साहब जो मीटिंग में व्यस्त हैं?नहीं। असली अपराधी आप हैं।जी हां, आप। जो इस वक्त अपनी स्क्रीन पर ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं। आपने इस कहानी को केवल कहानी की तरह पढ़ा। आपकी उंगली शायद अभी ‘लाइक’ या ‘शेयर’ की तरफ बढ़ेगी। आपने ज़हरा की मौत को अपने मनोरंजन का हिस्सा बनाया, दो पल के लिए अपनी संवेदनाओं का कोटा पूरा किया और अब आप अगले किसी रील या आर्टिकल की ओर बढ़ जाएंगे, जहाँ कोई शेफ पनीर की नई डिश सिखा रहा होगा।ज़हरा का वह टिफिन बॉक्स अभी भी उसी मलबे में पड़ा है। वह इंतज़ार कर रहा है कि कोई उसे उठाए, पर आप नहीं आएंगे। क्योंकि आपकी संवेदनाओं का ‘डाटा पैक’ खत्म हो चुका है और आपका दिल ‘आउट ऑफ कवरेज एरिया’ है।ज़हरा मर गई, और आपने उसे महज एक ‘नोटिफिकेशन’ बनाकर दफन कर दिया। असली कातिल हथियार नहीं चलाते, वे बस खामोश तमाशबीन बने रहते हैं।

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