डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा
उस सफेद, चिपचिपे और रहस्यमयी मैदे के गोले की शारीरिक संरचना किसी दार्शनिक गुत्थी से कम नहीं है। वह मैदा, जिसे डॉक्टर ‘आंतों का फेविकोल’ कहते हैं, मोमोज वाले के जादुई हाथों में आकर एक ऐसी पारदर्शी और महीन चादर बन जाता है, जिसके आर-पार पत्तागोभी का भविष्य और दुकानदार की नियत साफ नजर आती है। इसकी बनावट ऐसी है मानो किसी ने बहुत ही सलीके से एक ‘लजीज अपराध’ को सफेद कफन में लपेट दिया हो। ऊपर से वे नन्हीं-नन्हीं बारीक चुन्नटें… जैसे किसी महाकंजूस ने अपनी पूरी वसीयत को मोड़-तरोड़ कर एक छोटी सी पोटली में कैद कर दिया हो।
मोमोज जब स्टीमर के अंधेरे और उमस भरे कमरों से बाहर निकलता है, तो उसकी देह पर चढ़ी वह भाप उसे किसी डिजिटल फिल्टर सा अहसास देती है। वह इतना नाजुक और लचीला होता है कि अगर उसे थोड़ा जोर से घूर भर लिया जाए, तो उसकी ‘मैदे वाली खाल’ शर्म से फट जाए। उसकी गोलाई में वह वल्गर आकर्षण है, जिसे देखकर डाइट-चार्ट बनाने वाले न्यूट्रिशनिस्ट भी अपनी थ्योरी डस्टबिन में डाल देते हैं। लोग उसे प्लेट में ऐसे निहारते हैं जैसे वह कोई खाद्य पदार्थ नहीं, बल्कि मोक्ष का कोई गुप्त ‘शॉर्टकट’ हो।
असली पागलपन तो उस लाल चटनी के उस ‘अग्निपथ’ में है, जो दिखने में किसी खतरे के सिग्नल जैसी है, पर जिसका हमला सीधे नर्वस सिस्टम पर होता है। यह वह चटनी है जिसे बनाने वाला शायद पूरी मानवता से अपनी किसी पुरानी रंजिश का बदला ले रहा होता है। जुबान पर लगते ही ऐसा अहसास होता है मानो किसी ने 440 वोल्ट का नंगा तार छुआ दिया हो। आंखों से जो पानी निकलता है, वह दुख का नहीं, बल्कि उस ‘मिर्ची-क्रांति’ का गवाह होता है जो भीतर के पूरे भूगोल को हिलाकर रख देती है। लोग सिसकारियां भरते हैं, चेहरा टमाटर की तरह लाल होकर जलने लगता है, पर उस ‘अश्लील तीखेपन’ से हाथ नहीं खींच पाते। यह वह नशा है जहाँ इंसान खुद जल रहा होता है और साथ में ‘एक्स्ट्रा मेयोनीज’ की रिश्वत देकर अपनी जलन को शांत करने का ढोंग करता है।
सोसाइटी के उन ‘फिटनेस फ्रीक्स’ का हाल तो और भी विचित्र है, जो सुबह पार्क में घास पर नंगे पैर चलकर ‘शुद्ध जीवन’ का प्रवचन देते हैं। वही लोग शाम ढलते ही किसी अंधेरे कोने में मोमोज की रेहड़ी पर ‘एक प्लेट और भैया’ का गुप्त कीर्तन करते पाए जाते हैं। यह मोमोज का वह उन्माद है जिसने पिज्जा और बर्गर जैसे विदेशी सामंतों की चूलें हिला दी हैं। असल में मोमोज खाना केवल पेट भरना नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम के खिलाफ एक भूमिगत विद्रोह है जो हमें उबली हुई सब्जियां खाने की सलाह देता है। हम सब्जी तो खाते हैं, पर उसे मैदे के तहखाने में कैद करके और लाल चटनी के तेजाब में डुबोकर! उस सफेद गोले के भीतर छिपी हुई वह अधकचरी पत्तागोभी दरअसल हमारे आधुनिक समाज का ही प्रतीक है—बाहर से चिकना, चमकदार और पारदर्शी, मगर अंदर वही घिसी-पिटी और उबली हुई वास्तविकता। लोग इस सादगी के इतने भूखे हैं कि वे उस मैदे की नग्नता को भी ‘हॉट एंड सेक्सी’ डाइट मानकर गटक जाते हैं और फिर डकार लेकर अपनी नैतिकता के डेटा को रीसेट कर लेते हैं।