बंगाल का चुनाव—लोकतंत्र का पर्व या सत्ता का युद्धक्षेत्र?

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डा संतोष सिंह:पश्चिम बंगाल आज फिर एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ चुनाव केवल मतों की गिनती नहीं, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा की परीक्षा बनता जा रहा है। यह वही भूमि है जिसने विचार, संस्कृति और क्रांति को जन्म दिया, लेकिन आज उसी धरती पर राजनीति का स्वरूप इतना कठोर और टकरावपूर्ण हो गया है कि सवाल उठता है—क्या यह चुनाव है या सत्ता का खुला संघर्ष?राज्य की सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी का नेतृत्व एक ओर अपने कल्याणकारी मॉडल और जनसंपर्क की ताकत के दम पर मैदान में है, तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी आक्रामक रणनीति और वैकल्पिक शासन के वादे के साथ चुनौती पेश कर रही है। बीच में कभी निर्णायक भूमिका निभाने वाले वाम मोर्चा और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अब हाशिये पर खड़े दिखाई देते हैं—जैसे बंगाल की राजनीति ने उन्हें इतिहास के पन्नों में सीमित कर दिया हो।लेकिन असली प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीतेगा और कौन हारेगा।असली प्रश्न यह है कि बंगाल किस दिशा में जा रहा है?हिंसा का साया—लोकतंत्र की सबसे बड़ी विफलता बंगाल के चुनावों पर बार-बार एक ही दाग उभरकर सामने आता है—राजनीतिक हिंसा। क्या लोकतंत्र का अर्थ यह है कि विचारों की लड़ाई लाठियों और बमों से लड़ी जाए? चुनाव के समय यदि आम नागरिक भय में जीने लगे, तो यह केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की विफलता है।जब मतदान केंद्र सुरक्षा का प्रतीक बनने के बजाय डर का केंद्र बन जाए, तब यह मान लेना चाहिए कि राजनीति अपनी मर्यादा खो चुकी है।भ्रष्टाचार और तंत्र पर सवाल  शिक्षक भर्ती से लेकर विभिन्न योजनाओं तक, भ्रष्टाचार के आरोप लगातार सामने आते रहे हैं। जनता यह पूछ रही है—क्या योजनाएँ वास्तव में जनता के लिए हैं, या वे केवल सत्ता के संरक्षण का माध्यम बन गई हैं?यदि व्यवस्था पारदर्शी नहीं होगी, तो विश्वास कैसे बनेगा? और बिना विश्वास के लोकतंत्र केवल एक औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाता है।पहचान की राजनीति—सबसे खतरनाक मोड़    बंगाल का चुनाव अब केवल विकास का नहीं, बल्कि पहचान की राजनीति का भी मैदान बन चुका है। धर्म, संस्कृति और “हम बनाम वे” की मानसिकता को जिस तरह उभारा जा रहा है, वह खतरनाक संकेत है।
यह वही रास्ता है, जिसने कभी देश को भारत का विभाजन (1947) जैसे दर्दनाक दौर तक पहुँचा दिया था। क्या बंगाल उसी इतिहास की पुनरावृत्ति की ओर बढ़ रहा है, या वह उससे सीख लेगा?क्षेत्रीय स्वाभिमान बनाम राष्ट्रीय दृष्टि एक ओर क्षेत्रीय अस्मिता की बात होती है, दूसरी ओर राष्ट्रीय एकता का प्रश्न खड़ा किया जाता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इन दोनों को टकराव के रूप में प्रस्तुत करना ही सबसे बड़ी राजनीतिक चाल है।बंगाल भारत से अलग नहीं है—वह भारत की आत्मा का अभिन्न हिस्सा है। यदि क्षेत्रीय राजनीति राष्ट्रीय दृष्टि से कट जाती है, तो वह विकास नहीं, बल्कि अलगाव की ओर ले जाती है।मतदाता—सबसे बड़ी शक्ति, सबसे बड़ी जिम्मेदारी  इस पूरे परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका मतदाता की है। वही तय करेगा कि राजनीति का स्तर क्या होगा। यदि मतदाता जाति, धर्म या भय के आधार पर निर्णय लेता है, तो राजनीति भी उसी दिशा में जाती है।लेकिन यदि वह विकास, पारदर्शिता और शांति को प्राथमिकता देता है, तो राजनीति को भी बदलना ही होगा।अंतिम प्रश्न—बंगाल क्या चुनेगा?आज बंगाल के सामने विकल्प स्पष्ट है —क्या वह हिंसा, टकराव और विभाजन की राजनीति को स्वीकार करेगा?या वह शांति, विकास और लोकतांत्रिक गरिमा की ओर कदम बढ़ाएगा?यह चुनाव केवल सरकार बदलने का अवसर नहीं है, बल्कि यह तय करने का क्षण है कि बंगाल अपनी ऐतिहासिक चेतना को बचाए रखेगा या राजनीति के अंधे संघर्ष में उसे खो देगा।समय आ गया है कि बंगाल स्वयं से प्रश्न करे—क्या यह वही भूमि है, जिसने देश को विचार दिए थे,या अब यह केवल सत्ता संघर्ष का अखाड़ा बनकर रह जाएगी?निर्णय जनता के हाथ में है—और यही लोकतंत्र की अंतिम शक्ति है।

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