गाजीपुर। छावनी लाइन के पास स्थित इमली-महुआ गांव में मानव धर्म व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का प्रारम्भ परमहंस बाबा गंगारामदास के चित्र पर माल्यार्पण, पुष्पार्चन, प्रार्थना तथा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।सभा को संबोधित करते हुए वक्ता माधव कृष्ण ने कहा कि कबीर साहब ने कहा है कि लोग प्रायः दुख के समय भगवान को याद करते हैं, जबकि यदि सुख में भी स्मरण किया जाए तो दुख की स्थिति ही उत्पन्न नहीं होगी। उन्होंने कहा कि स्मरण का अर्थ केवल नाम जपना नहीं, बल्कि यह विचार करना है कि हम कौन हैं, हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है, जन्म और मृत्यु का रहस्य क्या है और मनुष्य बार-बार जन्म क्यों लेता है।उन्होंने कहा कि जब मनुष्य इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करता है तभी ज्ञान का द्वार खुलता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि रत्नाकर डाकू भी जब ऋषियों के उपदेश से आत्मचिंतन की ओर मुड़ा तो वही महर्षि वाल्मीकि बन गया। उन्होंने तुलसीदास की चौपाई का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां राम हैं वहां काम नहीं और जहां काम है वहां राम नहीं हो सकते।वक्ताओं ने कहा कि संसार की सभी साधनाएं मनुष्य के अहंकार को समाप्त करने के लिए हैं। जब तक मनुष्य तृष्णा और इच्छाओं में उलझा रहता है, तब तक वह सत्य से दूर रहता है। भगवान गौतम बुद्ध ने भी संसार के दुख का कारण तृष्णा को बताया और अष्टांगिक मार्ग के माध्यम से इससे मुक्ति का रास्ता बताया।उन्होंने कहा कि हिंदू समाज में शवयात्रा के समय “राम नाम सत्य है” का उच्चारण इसलिए किया जाता है, ताकि मनुष्य को यह स्मरण रहे कि इस संसार में परम सत्य केवल ईश्वर का नाम ही है। जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा और रोग के दुख का अनुभव कर ही भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था।परमहंस बाबा गंगारामदास जी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि सहनशीलता ही सच्चा धर्म है। सहनशील व्यक्ति ही समाज को सुख दे सकता है और सत्य के मार्ग पर चल सकता है। धर्मराज युधिष्ठिर के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया गया कि संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि लोग रोज मृत्यु को देखते हैं, फिर भी स्वयं को अमर समझते हैं।कार्यक्रम को राजिंदर यादव और इंद्रदेव सिंह ने भी संबोधित किया। सभा में सर्वराहकार भोला बाबा, कवि बाबा, सोनू, अनिरुद्ध, उपेंद्र, जयप्रकाश, राजेंद्र, रमेश, वीरेंद्र, अजय सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन आरती और प्रसाद वितरण के साथ हुआ।