मेरे दोस्त दुखीचंद

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Creator – Dr. Mukesh Asim:

गंगापुर सिटी राजस्थान

यह संसार दुखालय कहा गया है। दुख इस संसार का सबसे बड़ा प्रेरक बल है। दुःख न हो तो बाबाओं की, नेताओं की, अधिकारियों की दुकानदारी नहीं चले। दुःख है तो दुःख को रोने वाले हैं, दुःख प्रकट करने वाले हैं, विलाप करने वाले हैं! दुःख ही है जो आदमी के साथ जीवन भर चिपका रहता है। सुख क्या है? चार दिन की चांदनीऐसे गायब होती है जैसे चुनाव के बाद नेताजी, मतलब निकल जाने के बाद दोस्त।”read more:https://pahaltoday.com/anupam-verma-gets-irs-cadre-in-civil-services/                                                                                                                            ये विचार यूँ ही नहीं आए। इनके पीछे एक ठोस वजह है—मेरा मित्र विनोद, जिसे मैं प्रेम से दुखीचंद कहता हूँ। नाम उसका विनोद है, पर विनोद से उसका संबंध उतना ही है जितना संसद से शांति का। उसके चेहरे पर दुख का स्थायी भाव रहता है—मानो भगवान ने सारे दुखों का ठेका उसी को दे दिया हो।हम एक ही मोहल्ले में रहते हैं, इसलिए उससे बचना उतना ही कठिन है जितना बिजली बिल से। मैं जब भी उससे मिलता हूँ, पूरी सावधानी रखता हूँ कि मेरे चेहरे से कहीं खुशी की कोई किरण बाहर न निकल जाए। अगर उसे जरा भी आभास हो जाए कि मैं खुश हूँ, तो वह तुरंत दस कारण खोज निकालता है कि मुझे खुश नहीं होना चाहिए।read more:https://pahaltoday.com/anupam-verma-gets-irs-cadre-in-civil-services/                                                                                एक दिन बोले—“गर्ग साहब, आपकी नई कार है न… सावधान रहिए। आजकल चोरी बहुत हो रही है। और वो प्लॉट आपने जिससे लिया है, बड़ा बदमाश आदमी है। सारे कागज चेक कर लिए न? ऐसा हो ही नहीं सकता कि उसने कोई फ्रॉड न किया हो।”दुखीचंद को अपने दुख पर गर्व है। जो उनके सामने सुखी दिखता है, उसे वे मूर्ख समझते हैं। उनके हिसाब से दुनिया में सबसे ज्यादा दुखी वही हैं। कोई अगर दुख की प्रतियोगिता में उतरने की कोशिश करे, तो वे ऐसा विवरण सुनाते हैं कि सामने वाला हार मान जाए।read more:https://pahaltoday.com/foundation-stone-laid-for-marriage-hall-in-nandankala/                                                                                                                                                                                                                                                एक बार मैं बीमार पड़ा। खबर मिलते ही वे आ पहुँचे। आते ही बोले—“क्या हुआ? बुखार? अरे ये भी कोई बीमारी हुई? बीमार तो मैं हुआ था दो साल पहले। पूरे पंद्रह दिन अस्पताल में रहा। दस दिन तो डॉक्टर बीमारी पकड़ ही नहीं पाए। इतनी जांचें हुईं कि पूछिए मत—पेट स्कैन, ब्लड टेस्ट, सब! आखिर में बाबा बभूती प्रसाद की बभूती से ही आराम मिला।”यह कहते हुए उन्होंने जेब से वही बभूती निकालकर मेरे ऊपर छिड़क दी ।हरिद्वार इनका प्रिय तीर्थ स्थल ही नहीं, कर्मस्थली भी है। मृत्यु के बाद फूलों को गंगा में प्रवाहित करने की प्रक्रिया में पूरी श्रद्धा से भाग लेते हैं। अगर इनका वश चले, तो जीते-जी ही अपने फूलों को गंगा में बहा आएँ—क्या पता पीछे से ये सेल्फिश लड़के, हरामी, ज़मीन-जायदाद के साथ फूलों को भी बेच आएँ बाज़ार में!”वहाँ से वे गंगाजल के कनस्तर भरकर लाते हैं। शाम को खुद भी पीते हैं और पड़ोसियों को भी पिलाते हैं। उन्हें डर है कि कहीं अंतिम समय में गंगाजल उपलब्ध न हुआ तो आत्मा को कष्ट हो जाएगा। वैसे उनके अनुसार उनके शरीर में प्राण होना ही उनका सबसे बड़ा दुख है—क्योंकि यही सारे दुखों की जड़ हैं।  मृत्यु और शोक के मामलों में उनकी विशेष रुचि है। अगर मोहल्ले में कोई गंभीर बीमार हो जाए तो वे तुरंत सक्रिय हो जाते हैं।

एक दिन बोले—“गर्ग साहब, सक्सेना जी के पिताजी को देखा? बस अब गए कि तब! हम तो चार बार हाल पूछ आए। दो बार तो खाट से नीचे उतार लिया था, पर अभी भी सांस चल रही है।”

फिर शिकायत करते हुए बोले—“आज तो हमने ऑफिस से छुट्टी ले ली थी कि राम नाम सत्य हो जाएगा। दो घंटे खड़े रहे, आखिर निराश होकर लौटना पड़ा। छुट्टी बेकार चली गई।”                              शोकसभा में जाना उन्हें उतना ही प्रिय है जितना किसी को भंडारे में लंगर। अखबार उनका प्रिय साहित्य है—क्योंकि उसमें रोज नए शोक सन्देश  छपते हैं।

एक दिन खबर पढ़कर बोले—“यार, इस बार बाढ़ में सिर्फ 75 लोग मरे। पिछली बार 125 थे। पर अभी मौसम गया नहीं है, देखना रिकॉर्ड टूटेगा।”                                                                                     अगर कभी राशिफल में उनका भाग्य अच्छा लिखा मिल जाए तो अखबार पटक देते हैं—“ये सब झूठ है। भला मेरा दिन अच्छा कैसे हो सकता है?”

वे हर चीज से दुखी हैं—मोहल्ले की सड़क, बिजली, पानी, देश की राजनीति, दुनिया के युद्ध। कभी-कभी उनका दुख अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो जाता है—रूस, यूक्रेन और इज़राइल तक फैल जाता है।

एक दिन उन्होंने मुझसे कहा—“तुम लेखक बन गए हो, इन सब पर कुछ लिखते क्यों नहीं?”

मैंने कहा—“आप मोहल्ला समिति के सदस्य हैं, कुछ करते क्यों नहीं?”

वे बोले—“करता हूँ! कितना दुख प्रकट करता हूँ। पर ये सब बेकार है। वर्मा जी हर जगह फोटो खिंचवा लेते हैं। हमें पीछे धकेल देते हैं। दुनिया में धांधली ही धांधली है। हमारे बस में कुछ नहीं—सिवाय दुखी होने के।”

अब अक्सर कहते हैं—“भगवान उठा ले बस।”फिर कुछ सोचकर कि शायद भगवान इनकी सुन न ले और जल्दी उठा ले, उनके चेहरे पर इस संभावना का दुख और गहरा हो चला था।

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