शिक्षण संस्थान के लिए वीएन विद्यांत ने किया राजसी वैभव का त्याग : डॉ दिलीप अग्निहोत्री
लखनऊ: महापुरुषों की जयंती वस्तुतः उनसे प्रेरणा ग्रहण करने का अवसर प्रदान करती है। समाज के लिए निःस्वार्थ भाव से समर्पित व्यक्ति महान होता है। उनका आचरण, व्यवहार, जीवन शैली प्रेरणादायक होती है। जन्म जयंती पर उनके विचारों का स्मरण होता है। विक्टर नारायण विद्यांत ने समाज के हित में अपनी सम्पूर्ण चल अचल संपत्ति का दान कर दिया था। पांच जनवरी को उनकी जन्म जयंती मनाई जाती है। छह शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक विक्टर नारायण विद्यांत ने राजसी वैभव का त्याग कर दिया था। वर्तमान समय में वैश्विक सभ्यता का संकट एक बड़ी चुनौती है। आधुनिक वैज्ञानिक अविष्कारों का सृजनात्मक उपयोग सुनिश्चित होना चाहिए। इसके नकारात्मक प्रयोग ने अनेक जटिल समस्याओं को जन्म दिया है। इसमें प्राकृतिक, सामाजिक, शैक्षणिक, आर्थिक विसंगतियां शामिल है। इनका समाधान भारतीय चिन्तन से हो सकता है। विक्टर नारायण विद्यांत इसी चिंतन के संवाहक थे। उनकी जीवन शैली भी इसी के अनुरूप थी। विद्यांत जी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। विद्यांत जी राष्ट्रीय स्तर के शिक्षाविद होने के साथ ही,उच्च स्तरीय संगीतिज्ञ थे। विक्टर नारायण विद्यान्त त्यागी महापुरूष थे। एक समय उनके परिवार की गिनती लखनऊ के शीर्ष रईसों में होती थी। ब्रिटिश काल में उनके पिता और चाचा सरकारी कान्ट्रैक्टर थे। यहाँ का चारबाग स्टेशन, पक्का पुल, हजरतगंज का इलाहाबाद बैंक, सेन्ट्रल बैंक आदि भवनों का निर्माण उनके पिताजी ने ही कराया था। 5 जनवरी, 1895 में जन्मे विक्टर नारायण विद्यांत का बचपन, युवावस्था राजसी अन्दाज में बीता। चाँदी के बर्तनों में खाने, महंगी विदेशी कारों में घूमने की सुविधा उन्हें हासिल थी। लेकिन जीवन में ऐसा पल भी आया जब इन भौतिक सुविधाओं के प्रति उनकी आसक्ति नहीं रह गयी। उन्होंने अपनी विदेशी राल्स रायस कार एक मठ के स्वामी जी को दान कर दी। चाँदी के बर्तन, चाँदी के पलंग, महंगे वस्त्र सबका त्याग कर दिया। इसकी जगह बांस की चारपाई, अल्मुनियम के नाममात्र के बर्तन, दो जोड़ी साधारण वस्त्र अपने व अपनी पत्नी के लिए रखे। शेष सम्पत्ति विद्यान्त हिन्दू कालेज की स्थापना में लगा दी। उन्होंने बनारस में एंग्लो बंगाली कालेज तथा लखनऊ में छह शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। विद्यान्त हिन्दू प्राथमिक विद्यालय, विद्यान्त हिन्दू इंटर कालेज, विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय, शशि भूषण प्राथमिक विद्यालय, शशि भूषण बालिका इंटर कालेज और शशि भूषण बालिका महाविद्यालय उनके त्याग के प्रतीक के रूप में आज विद्यमान है। इसके अलावा राँची का अस्पताल, बंगाल के कृष्ण नगर का विद्यालय, अल्मोड़ा का टी.वी. सैनीटोरियम आदि संस्थाओं का वित्त पोषण वही करते थे। वह निर्धन, अनाथों की सहायता, बालिकाओं की शिक्षा, विवाह के लिए बड़ी मात्रा में धन खर्च करते थे। ब्रिटिश शासन ने उन्हें अवैतनिक मजिस्ट्रेट के पद से नवाजा था। विद्यान्त हिन्दू स्कूल की 1938 और डिग्री की स्थापना 1954 में की गयी थी। वह सांस्कृतिक गतिविधियों में भी रूचि रखते थे। लखनऊ के कालीबाड़ी ट्रस्ट, बंगाली क्लब, श्री हरिसभा के वह आजीवन सदस्य रहे। वह अखिल भारतीय बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए। 1938 में विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय प्रांगण में दुर्गापूजा समारोह की शुरुआत की। यह लखनऊ की प्राचीनतम दुर्गा पूजा में से एक है। उनका यह जीवन समाज के लिए प्रेरणादायक है। समाज व राष्ट्र के हित को सर्वोच्च मानना चाहिए। यही विचार देश को विकसित बनाएगा। वीएन विद्यान्त जी का जीवन इसी की प्रेरणा देता है। एक समय भारत विश्व गुरु था। विश्व के अन्य देशों से लोग यहाँ ज्ञान प्राप्त करने आते थे। अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त किया। आजादी के आन्दोलन में जहाँ अंग्रेजों को हटाने का प्रयास हो रहा था, वहीं देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक महापुरूष शिक्षा के प्रसार में लगे थे जिससे भारतीय समाज को जागरूक बनाया जा सके। विद्यान्त जी ऐसे लोगों में थे। भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने का प्रयास करना होगा। आगे बढ़ने के लिए पहला कदम खुद ही उठाना पड़ता है बाद में अन्य लोगों का भी सहयोग मिलता है। सबके सहयोग से शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जा सकता है। विद्यार्थी ही देश का भविष्य है। शिक्षित होने के साथ ही उन्हें राष्ट्रीयता व कर्तव्य पालन के विचार से ओत प्रोत होना चाहिए।