भारत में रेलवे की शुरुआत 16 अप्रैल 1853 को हुई थी। देश की पहली यात्री ट्रेन मुंबई के बोरीबंदर स्टेशन से ठाणे के बीच लगभग 34 किलोमीटर चलाई गई थी। ब्रिटिश शासन ने रेलवे की शुरुआत मुख्य रूप से व्यापार और सैन्य जरूरतों को पूरा करने के लिए किया था। धीरे-धीरे रेलवे का विस्तार देश के अलग-अलग हिस्सों में होने लगा। इसी विस्तार के दौरान कुछ ऐसे रेलमार्ग भी बनाए गए, जो भारत को उस समय के प्रमुख व्यापारिक केंद्रों और बंदरगाहों से जोड़ते थे। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण रेलमार्ग हिंदुमलकोट से होकर गुजरता था। यह मार्ग दिल्ली और बंबई को पाकिस्तान के कराची बंदरगाह से जोड़ने में अहम भूमिका निभाता था।राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले में स्थित हिंदुमलकोट का इतिहास काफी पुराना है। यह श्रीगंगानगर शहर से लगभग 26 किलोमीटर दूर बसा हुआ है। इस गांव की सबसे बड़ी पहचान भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास इसकी भौगोलिक स्थिति है। यहां पुराना रेलवे स्टेशन अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगभग 100 से 800 मीटर की दूरी पर स्थित था। इतनी कम दूरी पर रेलवे स्टेशन का होना अपने आप में खास बात थी। यही वजह है कि हिंदुमलकोट का नाम देश के सीमावर्ती रेलवे मार्गों के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।हिंदुमलकोट रेलवे स्टेशन पर 10 नवंबर 1897 को पहली बार ट्रेन पहुंची थी। उस समय इस क्षेत्र को ओडकी के नाम से जाना जाता था। स्थानीय इतिहास के अनुसार, बीकानेर रियासत के दीवान जमीन और संपत्ति की सीमाओं का निर्धारण करने के लिए इस इलाके में आए थे। इसी दौरान उनका निधन हो गया। उनके सम्मान और स्मृति में महाराजा गंगासिंह ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर हिंदुमलकोट रख दिया।विभाजन से पहले हिंदुमलकोट एक प्रमुख व्यापारिक मंडी के रूप में जाना जाता था। यहां चने का बड़े स्तर पर व्यापार होता था। इसके अलावा गेहूं, कपास और दूसरी कृषि उपज का भी कारोबार किया जाता था। स्टेशन के आसपास आज भी पुरानी दुकानों और इमारतों के अवशेष दिखाई देते है। ये इमारतें उस समय की व्यापारिक गतिविधियों की कहानी बताती है। उस दौर में हिंदुमलकोट का व्यापार केवल आसपास के गांवों और शहरों तक सीमित नहीं था। इसके संपर्क बहावलपुर, कराची, लाहौर, पेशावर, क्वेटा और अफगानिस्तान के काबुल तथा कंधार जैसे क्षेत्रों तक थे। यहां से बड़ी मात्रा में खाद्यान्न और दूसरी वस्तुएं रेल के माध्यम से अलग-अलग बाजारों में भेजी जाती थी। इस कारण यह क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन गया था।उस समय हिंदुमलकोट को नगरपालिका का दर्जा भी प्राप्त था। इससे इस क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। वर्ष 1959 में इसका नगरपालिका का दर्जा समाप्त कर दिया गया और इसे पंचायत के रूप में बदल दिया गया। ब्रिटिश शासन के दौरान मुंबई और दिल्ली को कराची बंदरगाह से जोड़ने के लिए अलग-अलग रेलमार्ग विकसित किए गए थे। इनमें एक प्रमुख मार्ग दिल्ली से बठिंडा होते हुए हिंदुमलकोट और बहावलपुर की ओर जाता था। इस रेलमार्ग से यात्रियों के साथ-साथ बड़ी मात्रा में सामान भी भेजा जाता था। आम नागरिक भी इस ट्रेन में सफर करते थे। उस समय रेलवे केवल यात्रा का साधन नहीं था, बल्कि व्यापार और लोगों के आपसी संपर्क का भी बड़ा माध्यम था।लेकिन वर्ष 1947 में भारत के विभाजन ने इस पूरे क्षेत्र की तस्वीर बदल दी। देश का बंटवारा होने के साथ ही कई पुराने रेलमार्ग भी दो देशों में बंट गए। हिंदुमलकोट से पाकिस्तान की ओर जाने वाला रेल संपर्क धीरे-धीरे समाप्त हो गया। पाकिस्तान की तरफ रेल पटरियां हटा दी गईं और दोनों देशों के बीच इस मार्ग से रेल परिचालन बंद हो गया। हालांकि, हिंदुमलकोट के पुराने रेलवे स्टेशन पर भारतीय क्षेत्र की ओर से आने वाली ट्रेनों का आवागमन वर्ष 1959 तक जारी रहा। इसके बाद इस पुराने स्टेशन का उपयोग भी बंद हो गया। आज यहां पुराने स्टेशन की खंडहरनुमा इमारत मौजूद है।read more:https://pahaltoday.com/manveer-singh-arrested-near-nepal-border-sent-to-punjab-under-tight-security/यह इमारत उस दौर की याद दिलाती है, जब इसी स्थान से ट्रेनें यात्रियों और सामान को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों तक जाती थी। भारत-पाकिस्तान सीमा के नजदीक होने के कारण हिंदुमलकोट का पुराना रेलवे स्टेशन सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील था। वर्ष 1970 में रेलवे स्टेशन को पुराने स्थान से हटाकर नया स्थान दिया गया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगभग तीन किलोमीटर दूर नया हिंदुमलकोट रेलवे स्टेशन और रेल ट्रैक बनाया गया। इस बदलाव के बाद रेलवे परिचालन नए स्टेशन से शुरू हुआ। आज हिंदुमलकोट का नया रेलवे स्टेशन भारतीय रेलवे के नेटवर्क से जुड़ा हुआ है। यहां से श्रीगंगानगर और बठिंडा की ओर रेल सेवाएं उपलब्ध है। क्षेत्र की रेल सेवाओं के माध्यम से यात्रियों को आसपास के प्रमुख शहरों से जुड़ने की सुविधा मिलती है। हालांकि, पुराना स्टेशन अब रेलवे परिचालन का हिस्सा नहीं है। वर्तमान समय में हिंदुमलकोट एक ग्रामीण क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। यहां के लोगों की आजीविका मुख्य रूप से खेती और स्थानीय व्यापार पर निर्भर है। भारत-पाकिस्तान सीमा के नजदीक होने के कारण यहां सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए जाते हैं। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान इस क्षेत्र में देश की सीमाओं की निगरानी करते हैं। इसके अलावा सीमा सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाएं भी इस क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण है।हिंदुमलकोट की खासियत यह है कि यहां इतिहास और वर्तमान दोनों एक साथ दिखाई देते है। एक तरफ पुराना रेलवे स्टेशन अपनी खंडहरनुमा इमारत के साथ बीते समय की याद दिलाता है। दूसरी तरफ नया रेलवे स्टेशन आज भी भारतीय रेल व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। कभी जिस रेलमार्ग से भारत के बड़े व्यापारिक केंद्र पाकिस्तान के कराची बंदरगाह तक जुड़े हुए थे, वह आज अंतरराष्ट्रीय सीमा पर आकर समाप्त हो जाता है।इसी वजह से हिंदुमलकोट का पुराना रेलवे मार्ग एक ‘डेड एंड’ के रूप में देखा जाता है। यहां तक भारतीय रेल की पटरियां पहुंचती है, लेकिन सीमा पार उनका आगे का रास्ता बंद हो चुका है। कभी व्यापार और यात्रियों की आवाजाही का प्रमुख माध्यम रहा यह मार्ग आज इतिहास का हिस्सा बन गया है। हिंदुमलकोट की पुरानी पटरियां और स्टेशन की खामोश इमारत हमें याद दिलाती है कि समय के साथ केवल सीमाएं ही नहीं बदलतीं, बल्कि उनके साथ शहरों, गांवों, व्यापार और यातायात का स्वरूप भी बदल जाता है।