दिव्या पाल ने स्वर्ण पदक जीतकर अपने मां-बाप और जन्मभूमि का नाम रोशन किया

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नगीना। धर्मूवाला की उड़नपरी दिव्या पाल ने बरेली में 5 किमी रेस में गोल्ड मेडल जीत कर बरेली में झंडा गाढ़ दिया है । दिव्या पाल ने गोल्ड मेडल जीतकर अपने माता-पिता व जन्मभूमि का नाम रोशन किया बल्कि युवाओं के लिए मिसाल बनीं। बेटी की कामयाबी की खुशी पर मात-पिता व क्षेत्र के लोग फूले नहीं समा रहे हैं, एक दूसरे को मिठाईयां खिलाकर जश्न मान रहे है  गोल्ड मेडल जीतकर बरेली से वापस आ रही दिव्या पाल के स्वागत में परिवार रिश्तेदार और क्षेत्र के लोग पाल के बिछाए बैठे बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।ग्रामीण अंचलों से निकलकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने का सिलसिला जारी है। तहसील नगीना हरेवाली मार्ग स्थित  छोटे से गांव धर्मूवाला की होनहार एथलीट दिव्या पाल ने बरेली के एमजेपीआरयू विश्वविद्यालय में आयोजित 6 वीं उत्तर प्रदेश स्टेट अंडर-23 / ओपन एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2026 में हिस्सा लिया कु दिव्या पाल ने अपनी रफ्तार का जादू चलाकर स्वर्णिम इतिहास रच दिया है।दिव्या ने 5 किलोमीटर की मैराथन रेस में अपनी प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ते हुए पहला स्थान हासिल कर गोल्ड मेडल अपने नाम किया।read more:https://pahaltoday.com/demand-to-remove-government-country-liquor-shop-villagers-stage-protest-at-the-collectorate/#google_vignetteउनकी इस ऐतिहासिक जीत से न केवल उसके माता-पिता रिश्तेदार धर्मूवाला गांव, बल्कि पूरी नगीना तहसील और बिजनौर जिले में जश्न का माहौल है। कड़ी मेहनत, अटूट समर्पण और माता-पिता का संबल गोल्ड मेडल जीतने के बाद दिव्या ने अपनी इस सफलता का श्रेय अपने माता-पिता और गुरुजनों को दिया। दिव्या ने कहा, “यह जीत मेरे पिता अशोक कुमार और माता माला देवी के त्याग, बलिदान और आशीर्वाद व निरंतर प्रोत्साहन का परिणाम है। उनके अटूट विश्वास ने मुझे हर कदम पर आगे बढ़ने का हौसला दिया।कोच और मार्गदर्शकों का विशेष योगदान शामिल है। दिव्या पाल मैदान पर अपनी गति और स्टेमिना के दम पर विरोधियों को पछाड़ने वाली दिव्या ने अपने कोच व मार्गदर्शक दुष्यंत सिंह और ओमराज सिंह का विशेष आभार जताया। उन्होंने कहा कि उनके सटीक मार्गदर्शन, वैज्ञानिक ट्रेनिंग और अनुशासन की बदौलत ही वे इस मुकाम तक पहुंच सकी हैं।”सपनों की कोई सीमा नहीं होती”दिव्या पाल की इस उपलब्धि ने क्षेत्र के युवा-युवतियों में एक नया जोश भर दिया, सीमित संसाधनों के बावजूद अपनी मेहनत के दम पर सफलता का शिखर छूकर दिव्या ने साबित कर दिया है कि अगर मन में लगन हो, तो गांव की पगडंडियों से निकलकर भी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय ट्रैक पर परचम लहराया जा सकता है। उनकी यह जीत खेल में रुचि रखने वाले क्षेत्रीय युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी है।

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