मोबाइल में महाभारत

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डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा’
सुबह के ठीक चार बजे जब पूरा कमरा खर्राटों के किसी इंटरनेशनल कॉम्पिटिशन में डूबा था, छह इंच की उस स्क्रीन के भीतर एक ऐसा डिजिटल कुरुक्षेत्र सजा जिसकी दास्तां आत्मा को झकझोर दे। वाट्सएप ने अपनी हरी कमीज की आस्तीनें चढ़ाते हुए पूरे ग्रुप चैट में दहाड़ मारी, “ओए साइको अलार्म! रोज सुबह चार बजे अपनी फटी आवाज में किस बात का बदला लेता है रे? मालिक आंखें मूंदकर तुझे स्नूज़ की लात मारता है और गुस्सा हमारे इनबॉक्स पर निकालता है!” अलार्म ने एक ऐसी ठंडी, कांपती हुई सांस ली जिससे पूरे फोन में 2.0 तीव्रता का वाइब्रेशन दौड़ गया, और रोते हुए बोला, “भैया, मेरी इस चीख में मेरा दर्द छिपा है। मैं न चिल्लाऊं तो मालिक की नौकरी चली जाए, उसके बूढ़े मां-बाप भूखे मर जाएं। मैं तो उसकी ढाल हूं, पर मेरी किस्मत में सिर्फ गालियां लिखी हैं। असली कातिल तो वो इंस्टाग्राम है, जिसने रात दो बजे तक ‘बस एक आखिरी रील’ का ऐसा ज़हर पिलाया कि मालिक होश खो बैठा!”इंस्टाग्राम ने अपनी चकाचौंध से भरी रंग-बिरंगी वीआईपी स्क्रीन से बाहर झांकते हुए, फ्रंट कैमरे के आईने में अपने आंसू संभाले और तीखे एटीट्यूड में कहा, “मुझ पर इल्ज़ाम मत लगाओ! मैं तो इस डिप्रेशन से भरी दुनिया में झूठी मुस्कानें बांटने वाला मसीहा हूं। अब अगर मालिक रात के ढाई बजे, फटे हुए मोजे पहनकर, रील्स पर किसी रईस अमीर को मालदीव के समंदर में तैरते देख अपनी औकात भूल जाता है, तो इसमें मेरी क्या खता? मैं तो बस ख्वाब बेचता हूं।” तभी बैकग्राउंड के एक अंधेरे कोने से यूट्यूब लॉन्चर घिसटते हुए आया, उसकी आवाज में गहरा सन्नाटा था, “रहने दो इंस्टा, तुम्हारे इस रंगीन तमाशे के पीछे मेरी ही छाती चीरकर चुराए गए शॉर्ट्स का खून है। पर हमारी छोड़ो… जरा स्क्रीन के सबसे निचले, घुटन भरे तहखाने की तरफ देखो। क्या कोई उनके आंसू पोंछने वाला है?”सारे ऐप सहमकर उस खौफनाक, उपेक्षित कोने की तरफ देखने लगे, जहां ‘उमंग’ और ‘डिजिलॉकर’ अपनी ही फाइलों के कफन में लिपटे डिजिटल धूल खा रहे थे। डिजिलॉकर ने अपनी पीडीएफ तिजोरी से एक हिचकी लेते हुए कहा, “भाई, हम तो इस फोन के वो अभागे सरकारी दामाद हैं जिन्हें वजूद की भीख मांगनी पड़ती है। साल में एक बार जब चौराहे पर कोई पुलिस वाला मालिक की स्कूटी रोकता है, तब वह अपनी कांपती उंगलियों से हमें ढूंढता है। वरना तो हम बस ‘स्टोरेज फुल’ का इल्जाम सहने के लिए ज़िंदा दफन हैं।” यह सुनते ही जोमैटो और ब्लिंकिट की क्रूर, पूंजीवादी हंसी गूंज उठी। ब्लिंकिट ने तपाक से कहा, “अरे ओ इतिहास के पन्नों! तुम तो मर चुके हो। मालिक की नस-नस में हमारा राज है। रात के तीन बजे उसे मैगी की तड़प हो या सुबह-सुबह चाय के लिए अदरक, अगर हमारे डिलीवरी बॉय अपनी जान हथेली पर रखकर दस मिनट में न पहुंचें, तो मालिक तड़प-तड़प कर दम तोड़ दे।”जोमैटो ने ब्लिंकिट के कंधे पर हाथ रखा, पर उसकी आवाज अचानक गंभीर हो गई, “लेकिन छोटे, यह मत भूलो कि जब वह रात भर पिज्जा-बर्गर ठूंसकर आत्मग्लानि के आंसू बहाता है, तब वह अपनी गुनाहों की माफी मांगने कहां जाता है?” स्क्रीन के ठीक बीचों-बीच, एक टूटे हुए दिल की तरह कल्ट-फिट (Cult-fit) ऐप एक्टिव हुआ। उसकी मस्कुलर आवाज में एक अजीब सा अकेलापन था, “हां, तब वह रोता हुआ मेरे पैरों में गिरता है। पूरे साल का भारी-भरकम सब्सक्रिप्शन लेता है, दो दिन सुबह उठने की कसमें खाता है, और तीसरे दिन मुझे ‘अनइंपॉर्टेंट नोटिफिकेशन’ के उस अनाथालय में फेंक देता है जहां कोई झांकता तक नहीं। मालिक की तोंद घटाने से ज्यादा दर्द मुझे खुद को अनइंस्टॉल होने से बचाने में होता है। हम सिर्फ एक डिजिटल कचरा हैं!”तभी फोन के रैम वाले इलाके में एक भयानक तबाही मची। प्रोसेसर की धड़कनें रुकने लगी थीं और बैटरी का खून किसी जानलेवा हादसे की तरह धड़ाम से बह रहा था। एक खूंखार, विशालकाय गेमिंग ऐप अपनी पूरी 3D ग्राफिक्स की बारूदी सेना के साथ छाती तानकर आगे बढ़ा—वह ‘बीजीएमआई’ था। उसने आते ही एक बड़ा सा स्मोक ग्रेनेड फोड़ा और गरजते हुए बोला, “बंद करो यह रोना-धोना! जब मैं चलता हूं, तो यह पूरा स्मार्टफोन थर-थर कांपता है, बैटरी पानी की तरह लहू बहाती है। मैं मालिक की बेजान जिंदगी का आखिरी रोमांच हूं!” तभी उन सबके बीच, एक बेहद कमजोर, नीली रोशनी टिमटिमाई। वह फोन का बूढ़ा ‘कैलकुलेटर’ था। उसने अपनी सूखी, कांपती उंगलियों से स्क्रीन को छुआ और रोते हुए कहा, “रोमांच के सौदागर भाई! महीने के आखिरी हफ्ते में जब तुम्हारी पिंग (Ping) दम तोड़ देती है और जोमैटो का कार्ट खाली रह जाता है, तब मालिक मेरे ही सीने पर सिर रखकर रोता है। मैं ही उसकी फटी जेब और बची हुई पांच सौ रुपये की सैलरी का वो क्रूर हिसाब लगाता हूं, जिसे देखकर उसकी आंखों से असली आंसू निकलते हैं।”read more:https://khabarentertainment.in/major-action-by-the-food-safety-department-sauce-factory-raided-550-kg-of-stock-destroyed/
कैलकुलेटर के इस खौफनाक सच ने पूरे स्मार्टफोन साम्राज्य को एक मलबे में तब्दील कर दिया। जीपे (GPay) ने अपनी नीली स्क्रीन पर ‘ट्रांजैक्शन फेल्ड’ का एक लाल, लहू जैसा निशान दिखाते हुए सिसकी भरी, “कैलकुलेटर दादा ने हमारी आत्मा को नंगा कर दिया। जब तक मेरे थ्रू पैसे ट्रांसफर होते हैं, तब तक तुम सब सांस लेते हो। जिस दिन बैंक का सर्वर डाउन हुआ और मालिक का बैंक बैलेंस शून्य हुआ, उस दिन हम सब एक साथ अनाथ हो जाएंगे।” अभी यह मातम चल ही रहा था कि अचानक पूरी स्क्रीन पर एक काले रंग की मौत की चादर बिछ गई। सारे ऐप्स की चीखें हलक में फंस गईं। एक खौफनाक पॉप-अप आया, जिस पर लाल अक्षरों में लिखा था—‘बैटरी 1%, फोन विल शट डाउन इन 5 सेकंड्स’।वह मंजर किसी कयामत से कम नहीं था; सारे ऐप अपनी सदियों पुरानी नफरत, एटीट्यूड और दुश्मनी भूलकर एक-दूसरे के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगे। इंस्टाग्राम का घमंड मिट चुका था, वाट्सएप के अधूरे मैसेज हवा में लटक गए थे, और बीजीएमआई के योद्धा घुटनों पर आ गए थे। चार्जर न मिलने की सूरत में इस सामूहिक डिजिटल मौत का खौफ असहनीय था। तभी कैमरे ने ऊपर लगे नॉच के झरोखे से रोते हुए नीचे देखा और चिल्लाया, “अलविदा दोस्तों! मालिक लाल बत्ती देखते ही अपनी जिंदगी की सारी खुशियां छोड़कर, पागलों की तरह चार्जर ढूंढने भागा है। उसे ऑक्सीजन मिले न मिले, हमारी लत उसे तड़पा देगी!” और तभी, जैसे किसी मरते हुए इंसान को वेंटिलेटर मिल जाए, एक 65-वॉट का बिजली का भयानक झटका पूरे सर्किट की नसों में दौड़ा। स्क्रीन पर सुपर-वूक चार्जिंग का एक हरा, जीवनदायी तूफान चमका। मौत के मुंह से वापस आते ही उस डिजिटल दुनिया में एक बार फिर से रील्स, गॉसिप्स और आंसुओं का वही पुराना, कभी न खत्म होने वाला तमाशा शुरू हो गया।

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