स्नेहा सिंह
कल्पना कीजिए, यदि पृथ्वी के उत्तर और दक्षिण ध्रुवों पर सदियों से जमी बर्फ एक दिन पूरी तरह गायब हो जाए तो क्या होगा? समुद्रों का जलस्तर बढ़ेगा, तटीय शहर डूबने लगेंगे, मौसम का संतुलन बिगड़ जाएगा और पृथ्वी का तापमान खतरनाक स्तर तक पहुंच सकता है। यह कोई विज्ञान कथा नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी पर्यावरणीय चुनौती है।पिछले कुछ दशकों में दुनिया ने जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से महसूस किया है। इसकी शुरुआत उस समय हुई जब पृथ्वी की सुरक्षा ढाल मानी जाने वाली ओजोन परत में छेद होने लगे। 1980 के दशक में वाहनों और उद्योगों से निकलने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) गैसों ने ओजोन परत को नुकसान पहुंचाया। हालांकि 1987 के मान्ट्रियल प्रोटोकोल के बाद दुनिया ने मिलकर इन गैसों के उपयोग पर रोक लगाई और स्थिति में काफी सुधार भी आया। लेकिन समस्या यहीं खत्म नहीं हुई।औद्योगिक क्रांति के बाद कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस के बढ़ते उपयोग ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ा दी। इन गैसों ने पृथ्वी के चारों ओर मानो एक अदृश्य कंबल बिछा दिया है, जो सूर्य की गर्मी को बाहर निकलने नहीं देता।परिणामस्वरूप पृथ्वी लगातार गर्म हो रही है। जंगलों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।वैज्ञानिक आंकड़े चिंताजनक हैं। वर्ष 1994 के बाद से पृथ्वी लगभग 28 ट्रिलियन टन बर्फ खो चुकी है। ध्रुवीय क्षेत्रों में मौजूद लगभग 90 प्रतिशत पुरानी मोटी बर्फ पिघल चुकी है। जो नई बर्फ हर सर्दी में जमती है, वह पतली होती है और गर्मियों में जल्दी पिघल जाती है।समुद्रों पर तैरती बर्फ सूर्य की लगभग 70 प्रतिशत गर्मी को वापस अंतरिक्ष में भेज देती है, जबकि खुला समुद्र केवल 7 प्रतिशत गर्मी ही लौटा पाता है। इसलिए जैसे-जैसे बर्फ घटती है, समुद्र अधिक गर्म होते जाते हैं और बर्फ के पिघलने की गति और तेज हो जाती है। यह एक खतरनाक दुष्चक्र है।कुछ साल पहले तक यह विचार किसी सपने जैसा लगता था, लेकिन अब वैज्ञानिक इसे वास्तविकता में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।कनाडा के कैम्ब्रिज बे क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने जमी हुई समुद्री बर्फ में छेद कर लगभग 50 हजार टन समुद्री पानी ऊपर पहुंचाया।read more:https://pahaltoday.com/retired-officers-house-in-up-notes-everywhere-currency-found-scattered-everywhere/ माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में यह पानी तुरंत जम गया।।नतीजा चौंकाने वाला था। जहां बर्फ की मोटाई लगभग डेढ़ मीटर थी, वहां नई जमी बर्फ ने उसकी मोटाई करीब 50 सेंटीमीटर बढ़ा दी।वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर यह तकनीक अपनाई जाए तो समुद्री बर्फ के अस्तित्व को कुछ समय के लिए बढ़ाया जा सकता है। केवल 50 सेंटीमीटर अतिरिक्त बर्फ भी समुद्री बर्फ को 7 से 10 दिन अधिक टिकाए रख सकती है।लेकिन यह आसान नहीं है। लाखों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में इस तकनीक को लागू करने के लिए भारी निवेश, अत्याधुनिक उपकरण और बड़े स्तर पर मानव संसाधन की आवश्यकता होगी। अनुमान है कि इस पर हर साल लगभग 10 अरब डालर तक खर्च हो सकता है। भविष्य में सबमरीन ड्रोन जैसी तकनीकें लागत कम करने में मदद कर सकती हैं।आर्कटिक क्षेत्र में पिछले 45 वर्षों में समुद्री बर्फ का विस्तार लगभग 45 प्रतिशत घट चुका है। कई वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो 2030 के दशक की शुरुआत में समुद्रों की गर्मियों वाली बर्फ लगभग गायब हो सकती है। ऐसे में बर्फ को दोबारा जमाने की तकनीक एक आशा तो जगाती है, लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं है। असली लड़ाई अभी भी कार्बन उत्सर्जन कम करने, जंगल बचाने और पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करने की है।ध्रुवीय बर्फ को फिर से जमाने के प्रयोग हमें यह बताते हैं कि विज्ञान अभी हार नहीं मान रहा। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि प्रकृति को बचाने का सबसे सस्ता और सबसे प्रभावी तरीका वही है, जिस नुकसान को हम रोक सकते हैं, उसे होने ही न दें।पृथ्वी अभी भी हमें दूसरा मौका दे रही है। सवाल यह है कि क्या हम उसका लाभ उठा पाएंगे?