नई दिल्ली । दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी के विधायकों को याद दिलाया है कि पंजाब विधानसभा चुनाव में महज 10 महीने बचे हैं। मतलब, नई जंग में पूरी तैयारी के साथ कूद पड़ना है। बचे हुए वक्त में सारे ही चुनावी वादे पूरे करने की कोशिश है। चुनावी वादों के हिसाब से देखें तो दिल्ली में कुछ अधूर वादे रह गए थे। 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले ही अरविंद केजरीवाल ने कई चुनावी वादों पर काम करना शुरू किया था। 2025 के दिल्ली चुनाव से पहले केजरीवाल ने यह भी माना था कि दिल्ली में तीन काम उनसे अधूरे रहे गए. एक- यमुना की सफाई, दो-साफ हवा और तीसरा-दिल्ली की सभी कॉलोनियों में साफ पानी पहुंचाना। बता दें असल में राघव चड्ढा एपिसोड और पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे, केजरीवाल को परेशान करने लगे हैं। दिल्ली की हार के दर्द से अभी पूरी तरह राहत भी नहीं मिली थी कि राघव चड्ढा ने नया दर्द दे दिया और पश्चिम बंगाल के नतीजे तो लगता है कुछ ज्यादा ही असर डाल रहे हैं। पंजाब के आप विधायकों से मुलाकात में केजरीवाल ने टीएमसी नेता ममता बनर्जी और दिल्ली चुनाव में अपनी हार को मिलता जुलता करार दिया और अब पंजाब को लेकर भी केजरीवाल को बंगाल जैसी ही आशंका सता रही है। लिहाजा आम आदमी पार्टी के विधायकों को अभी से अलर्ट मोड में डाल दिया है। बता दें राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा सहित 7 सांसदों ने हाल ही में आम आदमी पार्टी से बगावत किया, और बीजेपी में शामिल हो गए। बाद में पंजाब के सीएम भगवंत मान ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिले और बीजेपी में शामिल होने वाले सभी सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की।read more:https://worldtrustednews.in/councilors-mobilized-to-investigate-financial-irregularities-in-afzalgarh-municipal-council/ बात सिर्फ राघव चड्ढा और साथियों के अरविंद केजरीवाल की बनाई लक्ष्मण रेखा लांघने की नहीं है, उसके आगे खतरे और भी हैं जो आप को भारी पड़ सकते हैं और जरूरी नहीं कि नुकसान आने वाले पंजाब चुनाव में ही नुकसान हो, पहले भी संभव है। रिपोर्ट के मुताबिक आम आदमी पार्टी के विधायकों से बातचीत के आधार पर एक रिपोर्ट फाइल की है। बातचीत में विधायकों ने आप के अंदर पड़ी दरार और कलह के बारे में विस्तार से बताया। साथ ही, विधायकों के सामने चुनौतियों और उनकी समस्याओं का भी पता चला है। ध्यान देने वाली बात यह है कि विधायकों के मुताबिक ज्यादातर समस्याएं राघव चड्ढा और संदीप पाठक के आम आदमी पार्टी छोड़ देने के बाद पैदा हुई हैं। आम आदमी पार्टी के एक विधायक ने संवादहीनता की तरफ इशारा किया। विधायक का कहना था, हमारे पास अपनी बात रखने के लिए कोई मंच नहीं है। हमें चुप रहने को कहा जाता है। लीडरशिप को जमीन पर क्या हो रहा है, उसकी पूरी जानकारी नहीं है। कई विधायकों का कहना है कि लीडरशिप तक अपनी बात पहुंचाना मुश्किल है। लीडरशिप तक सीमित पहुंच के कारण, पार्टी वालंटियर्स में असंतोष बढ़ा है। विधायकों की शिकायत है कि पार्टी के सत्ता में आने के फौरन बाद ही निराशा का दौर शुरू हो गया था, क्योंकि वालंटियर्स को तभी से किनारे कर दिया गया। विधायकों का मानना है कि 7 में से सिर्फ दो सांसद ही संगठन की पृष्ठभूमि के थे, राघव चड्ढा और संदीप पाठक। विधायकों का सवाल है, बाकियों को क्यों चुना गया? और शिकायत है, सरकार बनने के बाद हुए उपचुनावों में भी जमीनी कार्यकर्ताओं के बजाय दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को टिकट दिया गया। विधायकों की बातचीत से मालूम होता है कि ऊपर से जो कुछ लग रहा है, आम आदमी पार्टी पर खतरा कहीं ज्यादा है. क्योंकि, राघव चड्ढा और संदीप पाठक