डिजिटल उपवास

Share

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 

धरमपुरा गांव के स्वघोषित समाजशास्त्री ‘फरेब सिंह’ ने जब प्रधानी के चुनाव में अपनी दावेदारी पेश की, तो उन्होंने गांव वालों को एक नया और डरावना सपना दिखाया—’डिजिटल नरक’। फरेब सिंह का चुनावी घोषणापत्र किसी धार्मिक ग्रंथ और सॉफ्टवेयर मैनुअल का मिला-जुला खिचड़ी था। उन्होंने तर्क दिया कि गांव की बदहाली का कारण सड़कें नहीं, बल्कि मोबाइल के भीतर बैठा वह ‘अदृश्य राक्षस’ है जो सबका डेटा और पुण्य एक साथ चबा रहा है। उन्होंने वादा किया कि जीतते ही वे पूरे गांव में ‘डेटा-जामर’ लगवाएंगे और हर ग्रामीण को एक ‘एनालॉग शांति कार्ड’ देंगे। उनका दावा था कि जो उन्हें वोट देगा, उसके स्मार्टफोन से निकलने वाली ‘नेगेटिव ऊर्जा’ को वे एक विशेष सरकारी फिल्टर के जरिए बिजली में बदल देंगे, जिससे गांव के मंदिर की लाइटें मुफ्त में जलेंगी। गांव के लोग, जो रील बनाने और देखने के चक्कर में अपनी फसल और अक्ल दोनों गंवा रहे थे, अचानक ‘डिजिटल वैराग्य’ के इस क्रांतिकारी विचार पर लट्टू हो गए।read more:https://khabarentertainment.in/three-blood-donors-donated-blood-on-behalf-of-jai-ambe-blood-donation-committee-

प्रचार के अंतिम सप्ताह में फरेब सिंह ने गांव के तालाब के पास एक ‘सोशल मीडिया विसर्जन कुंड’ बनवाया। यह वास्तव में एक गहरा गड्ढा था जिसके चारों ओर टूटे हुए कंप्यूटर के कीबोर्ड और माउस लटकाए गए थे। उन्होंने घोषणा की कि जो भी ग्रामीण अपनी ‘फेसबुक की बुराइयां’ और ‘व्हाट्सएप के झूठ’ इस कुंड में मानसिक रूप से विसर्जित कर फरेब सिंह को वोट देने का संकल्प लेगा, उसका अगला सात जन्म तक किसी भी ‘स्कैम कॉल’ या ‘लोन मैसेज’ से पाला नहीं पड़ेगा। विपक्षी उम्मीदवार ‘गपोड़ी लाल’ चिल्लाते रहे कि गांव को मुफ्त इंटरनेट चाहिए, लेकिन फरेब सिंह ने उन्हें ‘असुर’ घोषित कर दिया जो जनता की निजता को खतरे में डालना चाहता है। गांव के बुजुर्गों को लगा कि फरेब सिंह साक्षात कलियुग के यमराज से उनका स्मार्टफोन बचाने आए हैं। लोग अपनी फटी धोतियों के कोने में चिपके पुराने हैंडसेटों की पूजा करने लगे ताकि फरेब सिंह की ‘सुरक्षा ढाल’ उन्हें मिल सके।read more:https://khabarentertainment.in/dg-health-inspects-unnao-district-hospital-patients-express-satisfaction-with-treatment-directs-on-reduction-of-dust-and-fan

मतदान के अगले दिन जब फरेब सिंह की भारी मतों से जीत हुई, तो पूरा गांव अपना ‘डेटा-मुक्ति प्रमाण पत्र’ लेने उनके दरवाजे पर कतारबद्ध हो गया। फरेब सिंह ने बड़े इत्मीनान से अपनी नई चमचमाती गाड़ी से उतरे और सबके हाथ में एक-एक डाक टिकट जैसा कागज थमा दिया, जिस पर लिखा था— “डेटा ही माया है।” जनता हक्की-बक्की रह गई, “हुजूर, यह क्या है? हमारा नेटवर्क तो अब भी गायब है और मोबाइल में कुछ नहीं चल रहा!” फरेब सिंह ने अपनी नई आईफोन की स्क्रीन चमकाते हुए गंभीर स्वर में कहा— “मूर्खों! नेटवर्क गायब नहीं हुआ, मैंने गांव के टावर का किराया डकार कर उसे अपने नाम आवंटित करवा लिया है। अब तुम सब ‘डिजिटल उपवास’ करो ताकि मेरा निजी बिजनेस बिना किसी रुकावट के तेज चल सके। तुमने डेटा छोड़ा, मैंने उसे पकड़ लिया; यही तो असली समाजवाद है!” जनता सन्न खड़ी अपने पत्थर जैसे मोबाइल देख रही थी और फरेब सिंह अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ाकर ‘हाई-स्पीड’ घोटाले की नई फाइल जमा करने शहर की ओर कूच कर गए।read more:https://khabarentertainment.in/a-huge-free-eye-camp-will-be-organised-on-monday-at-gayatri-medical-store-akbarpur-rura-tiraha/

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *