रमजान के 30 रोजे फर्ज, साल भर में 20 रोजे नफिल — रोजेदार रेशमा बानो ने बताई इबादत की अहमियत

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जमानियां। पवित्र माह रमजान को लेकर रोजेदारों में गहरा उत्साह और आस्था देखने को मिल रही है। इस अवसर पर रोजेदार रेशमा बानो ने रमजान के रोजों की फजीलत और अहमियत पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया कि इस्लाम में रमजान के 30 रोजे हर बालिग मुसलमान मर्द और औरत पर फर्ज किए गए हैं, जबकि वर्ष भर में विभिन्न महीनों में रखे जाने वाले करीब 20 रोजे नफिल माने जाते हैं।उन्होंने बताया कि उलेमा के अनुसार प्रारंभिक दौर में मुहर्रम के दो रोजे वाजिब किए गए थे। बाद में जब अल्लाह तआला ने हजरत पैगंबर मोहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को नबी बनाया, तो उम्मत पर 50 रोजे फर्ज किए गए थे। पैगंबर की गुजारिश पर अल्लाह ने इसे कम कर रमजान के 30 रोजे फर्ज कर दिए और शेष 20 रोजे नफिल रखे गए, जिन्हें ईद के बाद छह रोजे, मुहर्रम, बकरीद, शाबान, रजब आदि महीनों में रखा जाता है।रेशमा बानो ने बताया कि नफिल रोजे रखने पर सवाब मिलता है, जबकि न रखने पर गुनाह नहीं होता। लेकिन रमजान के फर्ज रोजे जानबूझकर छोड़ना गंभीर गुनाह है। कुरआन और हदीस में स्पष्ट उल्लेख है कि हर बालिग मुसलमान पर रोजा अनिवार्य है।उन्होंने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति बीमार है, अत्यधिक बुजुर्ग है, या मानसिक रूप से अस्वस्थ है और रोजा रखने की क्षमता नहीं रखता, उसे छूट दी गई है। यदि बीमार व्यक्ति बाद में स्वस्थ हो जाए तो उसे छूटे हुए रोजे रखने होंगे। अगर कोई स्थायी रूप से असमर्थ है तो उसे 30 रोजों के बदले 60 गरीबों को दो वक्त का भोजन कराना होगा या प्रत्येक गरीब को लगभग पौने दो किलो गेहूं अथवा उसकी बाजार कीमत अदा करनी होगी।सफर में रहने वाले व्यक्ति को भी असुविधा होने पर रोजा न रखने की अनुमति है, लेकिन सफर समाप्त होते ही रोजों की कजा करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि रमजान की विशेष अहमियत इसलिए भी है क्योंकि इसी महीने में अल्लाह तआला ने कुरआन को पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व.) पर नाजिल किया।रेशमा बानो ने बताया कि रमजान में जन्नत के दरवाजे खोल दिए जाते हैं, जहन्नुम के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को कैद कर दिया जाता है। इस महीने में गरीबों, लाचारों और जरूरतमंदों की मदद करने का सवाब आम दिनों से 70 गुना अधिक बताया गया है।रोजे की दिनचर्या के बारे में उन्होंने कहा कि रोजेदार सहरी के समय अजान से पहले भोजन करते हैं और नीयत कर फज्र की नमाज अदा करते हैं। दिनभर अपने कार्य करते हुए जोहर और असर की नमाज पढ़ते हैं तथा कुरआन की तिलावत में समय व्यतीत करते हैं। शाम को अजान होते ही इफ्तार किया जाता है और मग़रिब की नमाज अदा की जाती है। रात में ईशा की नमाज के बाद जमाअत से तरावीह पढ़ी जाती है।रमजान का यह पावन महीना आत्मसंयम, इबादत और इंसानियत की सेवा का संदेश देता है, जिसमें हर मुसलमान पूरे समर्पण के साथ अल्लाह की रज़ा हासिल करने का प्रयास करता है।

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